अध्यात्म का पर्याय है संस्कृति : डॉ पण्ड्याजी

Published on 2017-02-28

शांतिकुंज में भासंज्ञाप की तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी प्रारंभ
१७ प्रांतों के ३५० से अधिक जिला व प्रांतीय समन्वयक शामिल

हरिद्वार २७ फरवरी।
अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि संस्कारों के द्वारा श्रेष्ठतम संस्कृति का निर्माण होना चाहिए क्योंकि संस्कृति अध्यात्म का पर्याय है। संस्कृतिनिष्ठ व्यक्ति ही सही मायने में समाज विकास में योगदान दे सकते हैं।

वे शांतिकुंज में आयोजित भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के समन्वयकों की तीन दिवसीय राष्ट्रीय गोष्ठी के प्रथम दिन संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अध्यात्म रूपी संस्कृति व्यक्ति के अंतर्जगत को सद्गुणों से भरती है, तो विज्ञान रूपी सभ्यता उन्हें जीवन की मूलभूत आवश्यकता को पूरा करने की विधि सिखाती है। दोनों के समन्वय से ही समाज का चहुंमुखी विकास हो सकता है। डॉ. पण्ड्याजी ने कहा कि पूज्य आचार्यश्री पाँच वीरभद्रों के माध्यम से विचार संशोधन के लिए, नवनिर्माण के लिए संसाधन जुटाने के लिए, दुरात्माओं को भयभीत करने के लिए, भावी परिजनों को सशक्त व सुदृढ़ बनाने के लिए एवं स्वयंसेवियों के संरक्षण के लिए जुटे हैं। डॉ. पण्ड्याजी ने कहा कि युवाओं को परिस्थितियों का दास नहीं, वरन् बाधाओं को चिरकर रास्ता बनाने वाले होने चाहिए। अखिल विश्व गायत्री परिवार भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के माध्यम से ऐसे युवाओं की फौज तैयार कर रहा है। ऐसे संस्कृतिनिष्ठ युवा ही समाज का भविष्य तय करेंगे।

इस अवसर पर डॉ. पण्ड्याजी ने राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए भासंज्ञाप कराने वाले राजस्थान के जिला राजसमंद- १२२८४८ विद्यार्थी के साथ प्रथम तथा राजस्थान के जनपद बांसवाड़ा- ११४००१ विद्यार्थी के साथ द्वितीय स्थान पर रहे। उन्हें स्मृति चिह्न एवं प्रशस्ति पत्र भेंटकर सम्मानित किया।

इससे पूर्व शांतिकुंज के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता श्री वीरेश्वर उपाध्याय ने युवाओं को भारतीय संस्कृति से जोड़ने के विविध पहलुओं पर चर्चा की। कहा कि लक्ष्य निर्धारण एवं उस दिशा में सार्थक पहल विद्यार्थी जीवन में होता है। संगोष्ठी के समन्वयक डॉ. पी.डी. गुप्ता ने बताया कि संगोष्ठी में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश सहित १७ प्रांतों के ३५० से अधिक जिला एवं प्रांतीय समन्वयक शामिल हैं। उन्होंने बताया कि संगोष्ठी में आगामी सत्र में अधिकाधिक विद्यार्थियों तक भारतीय संस्कृति को पहुंचाने हेतु कार्ययोजना पर भी चर्चा की जायेगी।

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