Published on 2017-04-16

इस हिमालय से भी गंगा निकलनी चाहिए : श्री कैलाश सत्यार्थीजी
विश्व भर में सुगंधी फैला रहे हैं देसंविवि के युवा : डॉ पण्ड्याजी

हरिद्वार, १६ अप्रैल।
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के पाँचवें दीक्षांत समारोह के अवसर पर आयोजित तीन दिवसीय आयोजन का सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ समापन हो गया। सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत युवाओं ने जम्मू कश्मीर से लेकर दक्षिण भारतीय नृत्य प्रस्तुत कर अतिथियों की खूब तालियाँ बटोरीं, तो वहीं गढ़वाली नृत्य, छत्तीसगढ़ी नृत्य ने लोगों को झूमने के लिए उल्लसित किया। शिव स्तोत्र के साथ योग प्रदर्शन व गायत्री विद्यापीठ की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत समूह नृत्य ने लोगों को रोमांचित कर दिया। गायत्री परिवार के जनक युगऋषि पं० श्रीराम शर्मा आचार्यजी के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों से लड़ने की जब्जा से लेकर समाज निर्माण के विभिन्न दृश्यों के माध्यम से युवा कलाकारों ने राष्ट्र धर्म को सर्वोपरि प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर नोबल शांति पुरस्कार विजेता श्री कैलाश सत्यार्थीजी ने अपनी भावनाओं को उत्साहपूर्वक व्यक्त किया। करीब २० राज्यों सहित विभिन्न देशों के प्रतिनिधित्व करने वाली देसंविवि को लघु भारत कहते हुए उन्होंने युवाओं को सतत आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। बचपन बचाओ अभियान के प्रमुख श्री सत्यार्थीजी ने बचपन को बचाने के लिए आवाहन करते हुए कहा कि १० करोड़ के लिए १० करोड़ युवा की बात कही। उन्होंने शांतिकुंज द्वारा संचालित हो रहे युवा क्रांति विस्तार वर्ष की प्रशंसा करते हुए कहा कि युवा आंदोलन का हिस्सा बनकर नई सभ्यता की रचनाकार बनें तथा अपने वर्तमान और भविष्य की इबादत स्वयं अपने जोश एवं ऊर्जा की स्याही से लिखें। श्री सत्यार्थीजी ने बच्चों, युवाओं और युवतियों पर किसी प्रकार की अन्याय को रोकने के लिए आगे बढ़ने के विविध उपायों की चर्चा की। उन्होंने अपने जीवन के अतीत के पन्नों को पलटते हुए विभिन्न मार्मिक संस्मरणों के माध्यम से युवाओं को अपने ऊँचे लक्ष्य पर टिके रहने पर जोर दिया। पाँच हजार से अधिक युवाओं के सम्मुख अपने आपको गायत्री परिवार को एक कार्यकर्त्ता के रूप में स्वीकार किया। गायत्री परिवार के समाज निर्माण के कार्यों में हम सब मिलकर कार्य करेंगे। उन्होंने बदलाव की संस्कृति को पिरोते हुए कहा कि 'हो गई है पीर पर्वत- सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय (देवसंस्कृति विवि) से भी गंगा निकलनी चाहिए। नोबल शांति पुरस्कार के विजेता श्री सत्यार्थीजी ने देसंविवि से विदा होने से पूर्व प्रशासकीय भवन के समीप रुदाक्ष का पौधा भी रोपा।

देसंविवि के अभिभावक कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि देसंविवि के विद्यार्थी न केवल पढ़ाई के क्षेत्र में वरन् सेवा के लिए भी जाने जाते हैं। यहाँ के विद्यार्थियों ने जिन- जिन स्थानों (देश- विदेश) में कार्य कर रहे हैं, उन- उन स्थानों में भारतीय संस्कृति की सुगंधी फैलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने पूर्व विद्यार्थियों के आजीविका के साथ राष्ट्रोत्थान में किये जा रहे सेवा कार्यों को प्रोत्साहित करते हुए इसे प्रत्येक युवा को अपनाने के लिए जोर दिया। इस अवसर पर देवसंस्कृति विवि की संरक्षिका श्रद्धेया शैलदीदीजी, कुलपति श्री शरद पारधीजी, प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी, कुलसचिव श्री संदीप कुमारजी, श्रीमती सुमेधा सत्यार्थीजी, श्रीमती शेफाली पण्ड्याजी, देश- विदेश से आये एल्यूमिनी, विद्यार्थीगण सहित शांतिकुंज कार्यकर्त्ता उपस्थित रहे।


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