वृक्षारोपण, संरक्षण अभियान को तीव्र गति दें - बृह्द् वृक्षारोपण अभियान-गुरुपूर्णिमा (९ जुलाई) से श्रावणी पूर्णिमा (७ अगस्त)

Published on 2017-07-07

वर्षाऋतु आ पहुँची अपनी उर्वरता भरी दिव्य उमंगें लेकर। सविता के प्रचंड ताप से तपी शोधित भूमि की प्यास बुझाने के लिये जहाँ मेघों से शुद्ध जल की स्थूल फुहारें झर रही हैं, वहीं पर्जन्य की सूक्ष्म धाराएँ धरती माता की उर्वरता को उभारकर प्राणिमात्र को निहाल करने के लिये उमग रही हैं। स्थूल फुहारें चर-अचर प्राणियों के ताप को शान्त कर शीतलता प्रदान कर रही हैं] पात्रता के अनुरूप खेतों, पोखरों, कुओं, तालाबों, झरनों, नालों, नदियों को अपने अनुदानों से पूरित कर रही हैं। उर्वरता की सूक्ष्म धाराएँ सूखे तृणों में भी प्राण संचारित करके उन्हें सूक्ष्म हरीतिमा का रूप दे रही हैं। भूमि के संपर्क में आने वाले बीजों के अंदर सुप्त क्षमता को जाग्रत, रूपान्तरित करके उन्हें पौधों, वृक्षों के रूप में विकसित करने के दिव्य पुरुषार्थ में लगी हैं। नव सृजन का एक अनोखा जीवन्त अभियान चल पड़ा है।

पृथ्वी के पर्यावरण को जीवन के अनुकूल बनाए रखने के लिये धरती माता को हरी चूनर पहनाने के लिये वृक्ष गंगा अभियान को गति देने के लिये संकल्पित सृजन शिल्पियों के लिये यह वातावरण एक दिव्य वरदान की तरह प्रस्तुत हुआ है। इसका भरपूर लाभ उठाने के लिये अपने विवेक और पुरुषार्थ को पैना बनाकर संकल्पों को सिद्ध करने का यह अनुपम सुयोग है। प्रकृति द्वारा बरसाए जा रहे स्थूल और सूक्ष्म अनुदानों का भरपूर उपयोग समय रहते कर ही लेना चाहिये।

युगनिर्माणी सैनिकों के अपने तंत्र को तो सक्रिय हो ही जाना चाहिये, साथ ही अन्य संगठनों, विद्यालयों, धर्म संस्थानों के भावनासिक्त पुरुषार्थियों को भी इस पुण्य प्रयोजन में भागीदार बनने के लिये प्रेरित-नियोजित करने की पूरक व्यवस्था भी बनाई जानी चाहिये।

जहाँ पौधे तैयार हैं, उन्हें सुपात्रों को वितरित करके व्यक्तिगत पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर तरुपुत्र अभियान को विभिन्न रूपों में क्रियान्वित करने के प्रयास किये जाने चाहिये। विभिन्न संगठनों के भावनाशीलों को उनके प्रभाव क्षेत्र की भूमि पर तरु आरोपण एवं संरक्षण की जिम्मेदारियाँ सौंपी जा सकती हैं।

ऊबड़ खाबड़ जमीनों पर उस क्षेत्र में सहजता से पनपने वाले वृक्षों के बीजों को बोने, बिखेरने का क्रम भी आसानी से बनाया जा सकता है। वृक्षों के बीज बड़ी मात्रा में एकत्रित किये जाएँ। उन्हें अच्छी मिट्टी और जैविक खाद में मिलाकर बोया जाए। बीजों के आकार के अनुरूप छेद गीली धरती में किसी नुकीली छड़ या छड़ी के सहारे आसानी से बनाए जा सकते हैं। उन छेदों में खाद- मिट्टी मिले बीजों को डाल दिया जाय। वर्षा के दिव्य अनुदान उन्हें सहज ही विकसित कर देगें। भावनाशील पुरुषार्थियों में यह प्रेरणा प्रसारित की जा सकती है।

मातु पिता सा विमल भाव रख करें पौध का आरोपण।
मित्र और स्रेही बनकर दें उनको पोषण संरक्षण।
पुत्र तथा पुत्री बन उनको सेवा दें] संतुष्ट करें।
तरु विषपायी अवगढ़दानी जीवन को परिपुष्ट करें।।

वृक्ष वनस्पतियाँ ही तो हमें देते हैं

प्राणवायु- वृक्ष ही पर्यावरण का विष (दूषित,जहरीली गैस) पीते और प्राणवायु (आॅक्सीजन) देते हैं। जल- मिट्टी का कटाव रोकते, वर्षा जल को सोखते, धरती का जल स्तर ऊँचा उठाते एवं नदियों को सदानीरा बनाते हैं। वृक्ष ही बादलों को आकर्षित करते और वर्षा का कारण बनते हैं। आहार (अन्न¸ फल, फूल)वस्त्र (कपास, जूट आदि) आवास (घर,फर्नीचर के लिए लकड़ियाँ)औषधियाँ (तरह-तरह की जड़ी, बूटियाँ)पर्यावरण संतुलन (पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं को आवास, धरती को उपजाऊपन, पथिक को छाया आदि।) मन की शांति और प्रसन्नता,हरे-भरे, वृक्ष, उपवन, वन मन को शांति, शीतलता देते हैं, तनाव दूर करने में सहायक होते हैं। एक वृक्ष अपने जीवन काल में 4 करोड़ रुपये से अधिक का अनुदान देता है।

वृक्ष लगाओ, जीवन बचाओ
मानवता का फर्ज निभाओ
हर व्यक्ति लगाये, हर वर्ष लगाये


योजनाएँ-
तरुपुत्र एवं तरुमित्र योजना श्रीराम स्मृति उपवन श्रीराम वन श्रीराम वाटिका सीता अशोक वाटिका गृह, नक्षत्र वाटिकाएँ त्रिवेणी, हरिशंकरी, पंचवटी आदि विस्तृत जानकारी, सहायता या मार्गदर्शन के लिए सम्पर्क करें |
youthcell@awgp.org

लगाये गये वृक्षों के चुनिंदा चित्र वृक्षों की संख्या व समाचार whatsapp - 9258360962 पर अवश्य भेजें |




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