प्रतिष्ठित टेंपल्टन फाउंडेशन की पुरस्कार समिति के प्रथम भारतीय जज होंगे डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी

Published on 2017-07-27
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आध्यात्मिक क्षेत्र के नोबल पुरस्कार माने जाने वाले टेंपल्टन पुरस्कार जांच समिति के प्रथम भारतीय जज होने का गौरव देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी को मिला है। उनके चयन होने पर अखिल विश्व गायत्री परिवार व देश- विदेश के सामाजिक व आध्यात्मिक संस्थानों के प्रमुखों ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए इसे वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की एक बड़ी उपलब्धि बताया। 

डॉ. चिन्मयजी को इस आशय का एक पत्र टेंपल्टन फाउण्डेशन के अध्यक्ष हिथर टेंपल्टन डिल ने भेजकर अनुरोध किया है कि वे इस पद को  संभालने के साथ इस क्षेत्र में कार्य कर रही संस्थाओं एवं लोगों का मार्गदर्शन करें। पत्र में बताया गया है कि १९७२ में स्थापित यह फांउडेशन प्रत्येक वर्ष विभिन्न देशों में से उन चयनित व्यक्ति को यह पुरस्कार देता है, जिन्होंने व्यावहारिक कार्यों के माध्यम से, जीवन के आध्यात्मिक आयाम की पुष्टि करने के लिए असाधारण योगदान दिया हो। उल्लेखनीय है कि भारत के तीन व्यक्तियों को अब तक यह पुरस्कार मिला है, जिनमें पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन, भारतरत्न मदर टेरेसा एवं प्रख्यात दार्शनिक पांडुरंग शास्त्री आठवले हैं। 

डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी का कार्यकाल अक्टूबर २०१७ से आगामी तीन वर्ष के लिए होगा। वे इस पद पर रहते हुए देश- विदेश में आध्यात्मिक व  सामाजिक क्षेत्रों में कार्य कर रहे जांच समिति द्वारा नामित व्यक्तियों में से किसी एक का चयन करेंगे। अपने चयन पर डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी ने कहा कि यह सम्मान केवल मेरा ही नहीं है, वरन् उन प्रत्येक भारतीयों के लिए है, जो इस क्षेत्र से जुड़े हैं। डॉ. चिन्मयजी ने अपने चयन को युगऋषि पूज्य गुरुदेव एवं वन्दनीया माताजी की विशेष अनुकंपा मानते हुए कहा कि जज के रूप में नामित होना गायत्री परिवार व देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के लिए ही नहीं, वरन् पूरे देश के लिए गौरव की बात है।

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