युग निर्माण विद्यालय, मथुरा के स्वर्ण जयंती वर्ष में हुआ भूतपूर्व विद्यार्थी समागम

Published on 2017-08-10

परम पूज्य गुरुदेव के विचारों का प्रभाव हमारे जीवन में दिखाई देना चाहिए। • आद. श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी  

मथुरा। उत्तर प्रदेश 
गायत्री तपोभूमि मथुरा में दिनांक १५ एवं १६ जुलाई की तारीखों में युग निर्माण विद्यालय की स्थापना का स्वर्ण जयंती समारोह सम्पन्न हुआ। सन् १९६७ से अब तक इस विवि. से शिक्षाप्राप्त सभी पूर्व विद्यार्थियों को इसमें भागीदारी का आमंत्रण भेजा गया था। विद्यालय के प्रथम प्राचार्य आदरणीय श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी सहित ४०० पूर्व विद्यार्थियों ने इसमें भाग लिया।

आदरणीय श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी के संग आदरणीय श्री मृत्युंजय शर्मा जी एवं श्री ईश्वरशरण पाण्डेय जी द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ समारोह का शुभारंभ हुआ। वक्ता- श्रोता सभी उत्साह से सरोबोर थे। आदरणीय श्री उपाध्याय जी ने परम पूज्य गुरुदेव की अपने बच्चों से अपेक्षाओं की चर्चा की। उन्होंने कहा कि परम पूज्य गुरुदेव ने उत्कृष्ट व्यक्तित्वों के निर्माण के लिए युग निर्माण विद्यालय की स्थापना की थी। हमारे जीवन में परम पूज्य गुरुदेव के विचारों का प्रभाव दिखाई देना चाहिए। हमारा व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली होना चाहिए कि लोग स्वयं हमारा अनुकरण करने के लिए उत्साहित हो जायें।   समागम में पधारे परिजनों के संकल्प ही इसकी सफलता थी। उन्होंने अपने बच्चों को भी युग निर्माण विद्यालय में भेजने का संकल्प लिया। तीनों पत्रिकाएँ स्वयं पढ़ने और दूसरों को पढ़ाने का उत्साह सभी में दिखाई दिया।   शांतिकुंज एवं तपोभूमि में सेवा दे रहे हैं ५० पूर्व विद्यार्थी 
युग निर्माण विद्यालय के लगभग ३० पूर्व विद्यार्थी शांतिकुंज में और २० विद्यार्थी गायत्री तपोभूमि में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। युग निर्माण विद्यालय के पूर्व विद्यार्थी रहे शांतिकुंज के जीवनदानी कार्यकर्त्ता सर्वश्री प्रताप शास्त्री, गणेश साहू, शालिग्राम सेन, बंधुलाल पटेल, संतोष सिंह भी इस समारोह में उपस्थित हुए। 


४०० विद्यार्थियों की भागीदारी युगसृजेता होने पर गौरव का बोध कराती अभिव्यक्तियाँ 
भूतपूर्व विद्यार्थियों ने यहाँ से प्राप्त शिक्षण से जीवन में आये परिवर्तन के मार्मिक संस्मरण सुनाए। उन्होंने अपना उत्साह कुछ इस प्रकार व्यक्त  किया। • हम यहाँ नहीं आए होते तो हम आज जो हैं वह नहीं होते, हम भी कहीं भौतिकता की चकाचौंध में खो गये होते। • हम औरों से अच्छा जीवन जी रहे हैं और प्रसन्न हैं। • हम आज भी अपने को विद्यार्थी अनुभव कर रहे हैं। • हम सौभाग्यशाली हैं कि हम प.पू. गुरुदेव एवं प.वं. माताजी के शिष्य हैं। वे प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देते लेकिन उनका शिक्षण आज भी हर कदम पर हमारे काम आता है। 

कनाडा से एक भूतपूर्व छात्र ने लिखा- 
प्रसन्नता की बात है कि ऐसे समागम का शुभारंभ हुआ है। वहाँ नहीं आ पाने से दु:खी हूँ, पर वहाँ का वातावरण अनुभव कर सकता हँ। मैं प्रतिवर्ष एक छात्र का खर्च भेजता रहूँगा। 

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