सभी समस्याओं का सुनिश्चित उपचार -सादा जीवन- उच्च विचार

Published on 2017-08-11
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साधन- सुविधा ही सबकुछ नहीं 
आज समाज के सामने असंख्य विकृतियों और व्यक्ति के सामने असंख्य समस्याओं के अम्बार खड़े हैं। पतन- पराभव के संकट, विग्रह के वातावरण, अराजकता- असमंजसों का निवारण- निराकरण इन्हीं दिनों किया जाना आवश्यक है। अगणित प्रकार की सुविधा- सम्पदाओं का अभिवर्द्धन भी होना है। पर उन सबके लिए मानवी चेतना का स्वस्थ, समुन्नत होना आवश्यक है। यदि भूमि पर, साधनों पर आधिपत्य जमाकर  बैठे हुए अथवा योजनाएँ बनाने वाले लोग विकृत मस्तिष्क के होंगे, तो उलझी हुई समस्याओं का समाधान तो दूर, विग्रह और ध्वंस ही खड़े करेंगे। 

मस्तिष्क विकृत, हृदय निष्ठुर, रक्त दूषित, पाचन अस्त- व्यस्त हो, शरीर के अंग- प्रत्ययों में विषाणुओं की भरमार हो, तो फिर वस्त्राभूषण की भरमार, अगर- चंदन का लेपन और इत्र, फुलेल का मर्दन बेकार है। वस्त्र- आभूषण जुटा देने और तकिये के नीचे स्वर्ण- मुद्राओं की पोटली रख देने से भी कुछ काम न चलेगा। जबकि स्वस्थ, सुडौल होने के कारण सुन्दर दीखने वाला शरीर गरीबी में भी हँसती- हँसाती जिन्दगी जी लेता है; आये दिन सामने आती रहने वाली समस्याओं से भी निपट लेता है और किसी न किसी प्रकार, कहीं न कहीं से प्रगति के साधन भी जुटा लेता है। 

वस्तुत: महत्त्व साधनों या परिस्थितियों का नहीं, व्यक्तिगत स्वास्थ्य, प्रतिभा और दूरदर्शिता का है। वह सब उपलब्ध रहे, तो फिर न अभावों की शिकायत करनी पड़ेगी और न जिस- तिस प्रकार के व्यवधान सामने आने पर अभ्युदय में कोई बाधा पड़ेगी। 

सर्वे भवन्तु सुखिन: 
वर्तमान युग की समस्त समस्याओं का समाधान है- सादा जीवन- उच्च विचार। इस सिद्धान्त को अपनाते ही प्रस्तुत असंख्य समस्याओं में से एक के भी पैर न टिक सकेंगे। जब हर व्यक्ति ईमानदारी, समझदारी, और बहादुरी की नीति अपनाकर श्रमशीलता, सभ्यता और सुसंस्कृति को व्यावहारिक जीवन में स्थान देने लगेगा, तो देखते- देखते समस्याओं के रूप में छाया अंधकार मिटता चला जाएगा। ग़ुजारे के लायक इतने    साधन इस संसार में मौजूद हैं कि हर शरीर को रोटी, तन को कपड़ा, हर सिर को छाया और हाथ को काम मिल सके। तब ग़रीबी- अमीरी की विषमता भी क्योंं रहेगी? जाति- लिंग के नाम पर पनपने वाली विषमता का अनीति- मूलक और दु:खदायी प्रचलन भी क्यों रहेगा? 

औसत नागरिक स्तर का जीवन स्वीकार कर लेने पर सुविस्तृत खेतों, देहातों में रहा जा सकता है और वायुमण्डल- वातावरण को प्रफुल्लता प्रदान करते रहने, संतुष्ट रखने में सहायक हुआ जा सकता है। 

प्राचीनकाल की सुसंस्कृत पीढ़ी इसी प्रकार रहती थी और मात्र हाथों के सहारे बन पड़ने वाले श्रम से जीवनयापन के लिए सभी आवश्यक साधन सरलतापूर्वक जुटा लेती थी। न प्रदूषण फैलने का कोई प्रश्न था और न शहरों की ओर देहाती प्रतिभा के पलायन का कोई संकट। न देहात दरिद्र, सुनसान, पिछड़े रहते थे और न शहर गंदगी, घिच- पिच, असामाजिकता के केन्द्र बनते थे। 

मनुष्य स्रेह और सहयोगपूर्वक रहने के लिए पैदा हुआ है। लड़ने, मरने और त्रास देने के लिए नहीं। यदि आपाधापी न मचे, तो फिर एकता और समता में बाधा उत्पन्न करने वाली असंख्य कठिनाइयों में से एक का भी अस्तित्व दृष्टिगोचर न हो। युद्ध प्रयोजनों में जो सम्पदा, शक्ति और प्रतिभा का नियोजन हो रहा है, उन सब को यदि बचाया जा सके और उन समूचे साधनों को नवसृजन प्रयोजनों में लगाया जा सके, तो समझना चाहिए कि इक्कीसवीं सदी के उज्ज्वल भविष्य के संबंध में जो कल्पनाएँ की गई हैं, वे सभी नये सिर से, नये ढाँचे में ढलकर साकार हो जायेंगी। 

बुद्धिमानों की नासमझी 
तथाकथित बुद्धिमान और शक्तिशाली लोग इन दिनों की समस्याओं और आवश्यकताओं को तो समझते हैं, पर उपाय खोजते समय यह मान बैठते हैं कि यह संसार मात्र पदार्थों से सजी पंसारी की दुकान भर है। इसकी कुछ चीजों इधर की उधर कर देने, अनुपयुक्त को हटा देने और उपयुक्त को उस स्थान पर जमा देने भर से काम चल जायेगा। समूचे प्रयास इन दिनों इसी दृष्टि से बन और चल रहे हैं। 

आज यद्यपि विश्व की मूर्धन्य प्रतिभाएँ हर समस्या को अलग- अलग समस्या मानकर उनके पृथक्- पृथक् समाधान खोजने और उपचार खड़े करने के लिए भारी माथा- पच्ची कर रही हैं; पर उनसे कुछ बन नहीं पा रहा है। न अस्पतालों, चिकित्सकों, औषधि, आविष्कारों पर असीम धनशक्ति- जनशक्ति लगाने से रोग काबू में आ रहे हैं और न पुलिस, कानून, कचहरी, जेल आदि अपराधों को कम करने में समर्थ हो रहे हैं। अचिन्त्य- चिन्तन, दुर्व्यसनों आदि के रहते बैंकों के भारी कर्ज और ढेरों अनुदान बाँटने पर भी गरीबी की समस्या का वास्तविक हल हाथ लग नहीं रहा है।   

परिवर्तन के महान क्षण 
अगले दिनों परिस्थितियाँ बदलेंगी। जनमानस यह देखकर रहेगा कि अगणित समस्याएँ उत्पन्न कहाँ से होती हैं? हमें उस रानी मक्खी को खोजना है, जो आये दिन असंख्यों अण्डे- बच्चे जनती है और जिनके भरण- पोषण में छत्तों की समस्त मधुमक्खियों के लगे रहने पर भी समस्याएँ जहाँ की तहाँ बनी रहती हैं। 
  
मनुष्यता समय- समय पर ऐसी आश्चर्यजनक करवटें लेती रही है, जिसके अनुसार देवमानवों का नया बसन्त, नई कलियाँ और नये फल- फूलों की सम्पदा लेकर सभी दिशाओं में अट्टहास करता दीख पड़ता है। महामानवों, देवपुरुषों, मनीषियों, सुधारकों, सृजेताओं, का ऐसा उत्पादन होता है, मानो वर्षा ऋतु ने अगणित वनस्पतियों और जीव- जन्तुओं की नई फसल उगाने की सौगन्ध खाई हो? 

अगले ही दिनों नये सृजेताओं की एक नई पीढ़ी हम में से ही विकासित होगी, जिसके सामने अब तक के सभी सन्तों, सुधारकों और शहीदों के पुरुषार्थ छोटे पड़ जायेंगे। 
  
जब आवेश की ऋतु आती है, तो जटायु जैसा जीर्ण- शीर्ण भी रावण जैसे महायोद्धा के साथ निर्भय होकर लड़ पड़ता है। गिलहरी श्रद्धामय श्रमदान देने लगती है और सर्वथा निर्धन शबरी अपने संचित बेरों को देने के लिए भाव- विभोर हो जाती है। यह अदृश्य में लहराता दैवी- प्रवाह  है, जो नवसृजन के देवता की झोली में समयदान, अंशदान ही नहीं, अधिक साहस जुटाकर हरिश्चन्द्र की तरह अपना राजपाट और निज का, स्त्री बच्चों का, शरीर तक बेचने में आगा- पीछा नहीं सोचता। दैवी आवेश जिस पर भी आता है, उसे बढ़- चढ़ कर आदर्शों के लिए समर्पण कर गुजरे बिना चैन नहीं पड़ता।   

यही है महाकाल की वह अदृश्य अग्नि शिखा, जो चर्मचक्षुओं से तो नहीं देखी जा सकती है, पर हर जीवन्त व्यक्ति से समय की पुकार कुछ महत्त्वपूर्ण पुरुषार्थ कराये बिना छोड़ने वाली नहीं है। ऐसे लोगों का समुदाय जब मिल- जुलकर अवांछनीयताओं के विरुद्ध निर्णायक युद्ध छेड़ेगा और विश्वकर्मा की तरह नई दुनिया बनाकर खड़ी करेगा, तो अंधे भी देखेंगे कि कोई चमत्कार हुआ। पतन के गर्त में तेजी से गिरने वाला वातावरण किसी वेधशाला से छोड़े गये उपग्रह की तरह ऊँचा उठ कर अपनी नियत कक्षा में द्रुतगति से परिभ्रमण करने लगेगा। 

वाङ्मय- राष्ट्र समर्थ और सशक्त कैसे बने? पृष्ठ १.३७- १.४० से संकलित, संपादित 

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