कनाडा और अमेरिका के परिजनों का युवा और प्रौढ़ शिविर जागो और जगाओ

Published on 2017-07-30
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कैम्प की विशिष्ट झलकियाँ 

• अन्यों के संस्मरण और अनुभूतियों से प्रतिभागियों को बहुत कुछ सीखने को मिला। 
• स्कूल पाठ्यक्रम से हटकर बौद्धिक ज्ञान अर्जित करने का लोगों का उत्साह देखते ही बनता था। 
• बच्चों को अपने आपको जानने और गीता का मर्म समझने का दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ। 
• बाल संस्कार शाला के बच्चों को अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का अद्वितीय अवसर मिला। उन्होंने योग, बौद्धिक कौशल, सप्त क्रांति पर आधारित कार्यक्रम एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का प्रदर्शन किया। 
• प्रतिभागियों ने नियमित उपासना, साधना, स्वाध्याय एवं रचनात्मक कार्यक्रमों में भागीदारी के साथ देव संस्कृति विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों  की आर्थिक सहायता करने के संकल्प लिये। 
• बाल संस्कार शाला मार्खम के आशुतोष जायसवाल एवं २५ अन्य बच्चों ने गौशाला- गौसंरक्षण के अनुदान डॉ. साहब के हाथों सौंपे। 

अमेरिका और कनाडा की युवा पीढ़ी में विकसित हो रही देवात्माओं को महानता के पथ पर अग्रसर करने के लिए वहाँ हर वर्ष अलग- अलग स्थानों पर यूथ कैम्प आयोजित होते रहे हैं। इनमें शामिल होने वाले बच्चों और युवाओं का पथ प्रदर्शन करने शांतिकुंज से स्वयं आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी वहाँ पहुँचते रहे हैं। इन शिविरों ने वहाँ के सैकड़ों युवाओं में आत्मवादी जीवन जीने की उमंग जगायी है, उन्हें जीने की सही राह दिखाई है, उनका जीवन सार्थक बनाया है। 

इस वर्ष कनाडा के किंग्स्टन, ओन्टेरियो में २६ से ३० जुलाई की तारीखों में युवा एवं प्रौढ़ शिविर आयोजित हुआ, विषय था 'जागो और जगाओ'। यह शिविर गायत्री परिवार मोंट्रियल, गायत्री परिवार वेस्ट ओंटारियो, गायत्री परिवार युग निर्माण टोरंटो और दिया कनाडा ने आयोजित किया था। ग्रेटर टोरंटो क्षेत्र, पश्चिमी कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका से आये १५० युवाओं एवं १५० वयस्कों ने इसमें भाग लिया। इस वर्ष आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी के साथ डॉ. चिन्मय पण्ड्या भी उनका मार्गदर्शन करने के लिए उपस्थित थे। 

यह शिविर बच्चों और युवाओं के तीन समूह तथा प्रौढ़ों के एक अलग समूह में संचालित हुआ। डॉ. साहब और डॉ. चिन्मय जी सभी समूहों में पहुँचे और प्रतिभागियों से मित्रवत चर्चा की, सुझाव दिये। प्रतिभागियों के लिए ये जीवन के परम सौभाग्यशाली क्षणों में से एक थे। 

प्रथम समूह में ९ से ११ वर्ष की आयु के बच्चों को महान नायकों के चरित्र के माध्यम से प्रगतिशील प्रेरणाएँ दी गयीं। उन्हें बताया गया कि अपार शक्ति होने के बावजूद नकारात्मक सोच और जीवन- मूल्यों के अभाव में वे अवगति की ओर बढ़ते गये। सकारात्मक सोच, रचनात्मक कार्य, सेवा- समर्पण का भाव कैसे उनके जीवन को शानदार बना सकता है, यह एक नाटक के द्वारा बताया गया। बाल संस्कार शाला की शिक्षिकाएँ सोनल जायसवाल और प्रज्ञा पटेल ने इस समूह का नेतृत्व किया। 
  
दूसरा समूह १२ से १५ वर्ष वय के बच्चों का था। शिक्षिका स्वाती वोरा, सुनीता मोदी और डॉ. रचना जिराथ ने इसका नेतृत्व किया। आत्म जागरूकता, आत्म विश्वास, आत्म सम्मान और आत्म संयम पर चर्चा केन्द्रित रही। इनके अलावा अनेक अनुरूप विषयों पर प्रतिभागियों ने चर्चा की और अपने अनुभव साझा किये। उन्हें कथा- कहानियों के माध्यम से जीवन में परिवर्तन के सूत्र बताये गये। 

तीसरा समूह १६ से ३० वर्ष के युवाओं का था। तीनों दिन के लिए अनुभवी कार्यकर्त्ताओं की टीम ने कई हफ्तों की तैयारी के साथ अलग- अलग विषय- वस्तु तैयार की थी। क्रमश: गुरुदेव की लिखी पुस्तक 'मैं क्या हूँ?', 'स्व - परिवर्तन' और 'परिवर्तन के महान क्षण' पर गहन विचार मंथन हुआ। 

इस समूह में एक रोचक विषय रखा गया- चिन्मय भैया से कुछ भी पूछें। प्रश्नोत्तरी के इस क्रम में सभी को तरह- तरह के अनुभव साझा करने का अद्वितीय अवसर मिला। 

वयस्क समूह का नेतृत्व शांतिकुंज प्रतिनिधि प्रो. विश्वप्रकाश त्रिपाठी, ओंकार पाटीदार, छबिराम गढ़िया ने किया। आदरणीय डॉ. साहब एवं आदरणीय डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी ने आध्यात्मिकता और जीवन में परिवर्तन की प्रमुख अवधारणाओं पर चर्चा की। 
सत्र का समापन सेंट लॉरेंस नदी- झील के सुरम्य तट पर तरह- तरह के वॉलीबॉल, रस्साकशी एवं बच्चों के अनेक खेलों के साथ हुआ। बच्चों  ने अपने आदर्शों के साथ खेलने में अपार आनन्द की अनुभूति की। आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी एवं डॉ. चिन्मय जी ने विदाई उद्बोधन दिये। 

गुजरात बाढ़ राहत कार्यों में सहयोग 
आदरणीय डॉ. साहब के आह्वान पर कनाडा और अमेरिका की सभी शाखाओं ने एवं परिजनों ने गुजरात एवं राजस्थान में आयी भीषण बाढ़ से प्रभावित लोगों की उदारतापूर्वक सहायता करने का संकल्प लिया। कई लोगों ने तत्काल आर्थिक सहयोग भी प्रदान किया। 

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