Published on 2017-09-07
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देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति माननीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी हैं शिक्षा समिति के अध्यक्ष 
बैठक में योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा से जुड़ी देश की प्रतिष्ठित संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित थे। सभी शिक्षण संस्थानों में एक जैसा पाठ्यक्रम लागू करने और गुण्वत्ता- प्रामाणिकता बढ़ाने की तैयारी अगली बैठक देव संस्कृति विश्वविद्यालय में होगी। पाठ्यक्रम निर्माता शिक्षा समिति की पहली बैठक स्वामी विवेकानन्द योग अनुसंधान संस्थान, बैंगलुरु में आयोजित हुई थी। देव संस्कृति विश्वविद्यालय की ओर से आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी के प्रतिनिधि श्री सुरेश वर्णवाल इस बैठक में भाग लेने गये थे। इस पाठ्यक्रम के निर्माण में देव संस्कृति विश्वविद्यालय का अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान हैं।

नई दिल्ली 
देश के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी के प्रयासों से जब से अंतराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाने लगा है, पूरे विश्व में योग ही नहीं, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा जैसी भारतीय स्वास्थ्य विधाओं के प्रति सम्मान बढ़ा है। आयुष मंत्रालय समय की माँग के अनुरूप पूरे देश में इन विधाओं की गुणवत्ता बढ़ाने और एकरूपता लाने की दिशा में प्रशंसनीय प्रयास कर रहा है। 
आयुष मंत्रालय द्वारा इसी क्रम में 'बैचलर आॅफ नेचुरोपैथी एण्ड यौगिक साइंस' का नया पाठ्यक्रम तैयार किया जा रहा है। इसे बीएनवायएस की उपाधि देने वाली देश की सभी शैक्षिक संस्थाओं में लागू किया जायेगा। इस पाठ्यक्रम को तैयार करने में देव संस्कृति विश्वविद्यालय की अहम भूमिका है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति माननीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी पाठ्यक्रम तैयार करने वाली शिक्षा समिति के अध्यक्ष हैं। 
१८ अगस्त को माननीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी की अध्यक्षता में आयुष भवन, नई दिल्ली में शिक्षा समिति की बैठक हुई। इसमें समिति से जुड़ी सभी संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। माननीय श्री ईश्वर एन. आचार्य, निदेशक सेण्ट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन योग एण्ड नेचुरोपैथी (सीसीआरवायएन) की मुख्य उपस्थिति में श्री रामचंद्र भट्ट- एसव्यासा बैंगुलुरू, वैद्य राजेश कोटेचा, श्री सुबोध तिवारी- कैवल्यधाम गुणे, सुश्री सत्यलक्ष्मी- एमआईवाय पुणे, नीरजा रेड्डी- जीएनसीसी हैदराबाद, आरती माहेश्वरी- मुम्बई, डॉ. प्रशांत शेट्टी, के. गोविंद भट्ट- बैंगलुरु, अर्पण भट्ट- जामनगर आदि लगभग २० संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने इसमें भाग लिया। 
इस बैठक में पाठ्यक्रम निर्माण के लिए अब तक हुए कार्यों की समीक्षा की गयी, सुझाव दिये गये। पाठ्यक्रम निर्धारण के साथ चिकित्सकों के  पंजीयन, उनकी प्रामाणिकता, शिक्षकों के प्रशिक्षण, संबंधित विषयों पर शोधकार्य और उनके प्रकाशन जैसे विषयों पर चर्चा की गयी। 
माननीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने अपने विश्वविद्यालय के प्रायोगिक अनुभवों के आधार पर महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये। उन्होंने कहा कि योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा केवल शारीरिक स्वास्थ्य लाभ के लिए ही नहीं, सृजनात्मक सोच विकसित करने और विद्यार्थियों को एकाकीपन एवं स्वार्थपरक चिंतन से उबारकर उनमें पारिवारिकता और सामाजिकता के भाव विकसित करने में बहुत सहायक सिद्ध होती है। 
माननीय डॉ. साहब ने बैठक के निष्कर्ष प्रस्तुत करने के साथ इसकी अगली बैठक देव संस्कृति विश्वविद्यालय में रखने का प्रस्ताव रखा, जिसे स्वीकार कर लिया गया है।


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