Published on 2017-09-22
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विभूतियाँ भगवान की धरोहर हैं। हम तो उनके निमित्त मात्र हैं। नये युग के स्वागत के लिए हम सबको आगे आना चाहिए। समाज के विचारों को बदलने के लिए, व्यवस्थाओं और परम्पराओं को बदलने के लिए हमें अपने समय, प्रतिभा, धन, साधन एवं भावनाओं की विभूतियों को भगवान के कामों में नियोजित करना ही चाहिए।

10 सितम्बर को मनीषिका, गोपाल भवन, 43 कैलाश बोस स्ट्रीट, कोलकाता में नगर के कुछ विशिष्ट महानुभावों की गोष्ठी आयोजित हुई, जिनके मन में समाज के उत्कर्ष के लिए कुछ करने की चाह थी। आदरणीय डॉ. साहब ने स्वामी विवेकानन्द के अनेक दृष्टांतों के माध्यम से उन्हें बताया कि भगवद्चेतना अग्रदूतों की अंतरात्मा को झकझोरती है। उनके अंत:करण में सेवा- साधना की हिलोरें उठती हैं।

गीता के श्लोकों की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि परिवर्तन के इन महान क्षणों में हम असमंजस में न रहें। स्वामी विवेकानन्द की तरह से हम सोचें कि समाज और संस्कृति के उत्कर्ष के लिए हम क्या कर सकते हैं? अपनी प्रतिभा, धन, समय, साधन एवं भावनाओं के सुनियोजन से प्रचलित परंपराओं को, व्यवस्थाओं को और विचारों को बदलने में क्या और कितना योगदान दे सकते हैं?
आदरणीय डॉ. साहब ने इस अवसर पर कोलकाता में देव संस्कृति विश्वविद्यालय के निर्माण, जोन केन्द्र के निर्माण, बाल संस्कार शाला, स्वावलम्बन, वृक्षारोपण जैसे गायत्री परिवार के विभिन्न आन्दोलनों की योजनाओं पर प्रकाश डाला और इनमें भरपूर सहयोग करने का आह्वान किया।

इस संगोष्ठी में नगर की जानी- मानी हस्तियाँ उपस्थित थीं। श्री विश्वनाथ साक्सरिया, श्री प्रकाश अग्रवाल (कोचीन), श्री कुलदीप राजपुरोहित, डॉ. राणा (सेना के अधिकारी), श्री लक्ष्मीकान्त तिवारी, श्री बसंत गोयनका, श्री धर्मपाल अग्रवाल, श्री नंदलाल पंसारी, श्री पुरुषोत्तम परसरामपुरिया, श्री महेन्द्र गोयल, श्री केशर पहाड़िया, श्री प्रयागराज आर्य, श्री आर.एन. शर्मा आदि महानुभावों ने गोष्ठी में भाग लेते हुए आदरणीय डॉ. साहब के विचारों का सान्निध्य प्राप्त किया।

प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन सहित आदरणीय डॉ. साहब के कोलकाता प्रवास में जनभावनाओं में सृजन- संवेदनाएँ उकेरने में श्री सूरज प्रसाद शुक्ला, युगगायक श्री ओंकार पाटीदार, पुष्कर राज, बसंत यादव तथा मीडिया सहयोगी श्री संतोष सिंह का उल्लेखनीय योगदान रहा। शांतिकुंज की इंटरनेट सेवाओं के माध्यम से हजारों लोगों को प्रेरणाएँ मिलीं।


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