Published on 2017-09-18
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शांतिकुंज के व्यवस्थापक आदरणीय श्री गौरीशंकर शर्मा जी का आश्विन कृष्ण एकादशी, संवत् २०७४ के पावन दिन, दिनांक १६ सितम्बर को देहावसान हो गया। वे ७४ वर्ष के थे और पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ थे।

स्व. श्री गौरीशंकर शर्मा जी भाव संवेदनाओं से ओतप्रोत एक ऐसी दिव्य आत्मा थे जो पीड़ित मानवता की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहा करते थे। वे अखण्ड ज्योति के माध्यम से सन् १९७० से मिशन से जुड़े, बार- बार शांतिकुंज आते रहे और समयदान देते रहे। परम पूज्य गुरुदेव के कहने पर सन् १९८२ में जीवनदानी कार्यकर्त्ता के रूप में पूरी तरह से शांतिकुंज आ गये।

शुरू से ही उन्होंने समयदानी कार्यकर्त्ताओं के नियोजन, भोजनालय, सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, स्वावलम्बन प्रशिक्षण जैसे विभागों का दायित्व सँभाला जो सीधे- सीधे लोगों की सेवा से जुड़े थे। वे स्वयं सामने खड़े होकर हर कार्य को बड़ी कुशलता से सँभालते दिखाई देते थे। भाव संवेदना और व्यवस्था बुद्धि के धनी श्री गौरीशंकर शर्मा जी ने सन् १९९९ से शांतिकुंज के व्यवस्थापक पद का कार्यभार सँभाला। उसके बाद भी वे उन विभागों की जिम्मेदारियाँ स्वयं सँभालते रहे। हर कार्यकर्त्ता की कुशलक्षेम जानना और अपने छोटे भाई की तरह उनका ध्यान रखना उनका सहज स्वभाव था।

श्रद्धा- समर्पण की गाथा
स्व. श्री गौरीशंकर जी भीलवाड़ा, राजस्थान के निवासी थे। उन्होंने राजस्थान पुलिस, भारतीय सेना तथा भारत सरकार के खुफिया विभाग 'राँ' के अंतर्गत सी.बी.आई. १८ वर्षों तक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में सेवाएँ प्रदान कीं। वे परम पूज्य गुरुदेव के व्यक्तित्व और विचारों से इतने प्रभावित थे कि उनके कहने पर मात्र दो वर्ष की शासकीय सेवाओं के बाद पेंशन का लाभ पाने की अपेक्षा किये बिना और अपने परिवार के घोर विरोध के बावजूद तत्काल शांतिकुंज आ गये।

आत्मवादी जीवन दर्शन
स्व. श्री गौरीशंकर शर्मा जी ने 'सादा जीवन- उच्च विचार' के सूत्र को हर पल अपने जीवन में अपनाया और अपने हर संदेश में आत्मवादी जीवन दर्शन का प्रचार किया। चरित्र, चिंतन और व्यवहार की उत्कृष्टता, पारदर्शिता और प्रामाणिकता को उन्होंने अध्यात्म जगत की सर्वश्रेष्ठ सिद्धि माना। स्वयं अपने जीवन का आदर्श प्रस्तुत करते हुए वे लोकसेवियों को इन सूत्रों को अपनाने की प्रेरणा देते रहे।

बड़े दायित्व सँभाले
स्व. आदरणीय श्री गौरीशंकर जी शांतिकुंज के व्यवस्थापक थे, लेकिन जीवनभर एक स्वयंसेवक बनकर ही रहे। यश, प्रतिष्ठा की कामना के बिना प्रमुख दायित्वों को बड़ी जिम्मेदारी से सँभाला। हरिद्वार में हुए श्रद्धांजलि समारोह, महापूर्णाहुति तथा शताब्दी समारोह हों या क्षेत्रों में होने वाले अश्वमेध महायज्ञ; उनमें भोजनालय, सुरक्षा जैसी व्यवस्थाएँ वे स्वयं सँभालते थे। वे आपदा प्रबंधन प्रकोष्ठ, शांतिकुंज के प्रभारी थे। आपदा की हर घड़ी में पीड़ित मानवता की सेवा करना उनका जुनून था।

संस्कारों की विरासत
स्व. श्री गौरीशंकर जी ने अपने पूरे परिवार को संस्कारों की अनमोल विरासत सौंपी है। गुरुकृपा से उनकी धर्मपत्नी श्रीमती यशोदा जीजी भी उतनी ही मृदुभाषी, उतनी ही सेवाभावी हैं। वे शांतिकुंज के महिला मण्डल की प्रभारी हैं। पुत्र चि. रोहित एवं पुत्रवधु श्रीमती अंतिमा अपने दो बच्चों के साथ अमेरिका में सेवारत हैं।

अपूरणीय क्षति
कार्यकर्त्ताओं के हृदय में अपना विशिष्ट स्थान बना चुके श्री गौरीशंकर शर्मा जी की चिर विदाई अपने मिशन की एक अपूरणीय क्षति है। आदरणीया शैल जीजी, आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी, आदरणीय श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी सहित शांतिकुंज के सभी वरिष्ठ- कनिष्ठ कार्यकर्त्ताओं ने उन्हें अश्रुपूरित विदाई दी। उनकी अंतिम यात्रा में उनके परिवारी जनों सहित पूरा शांतिकुंज उमड़ा था। सभी ने अपने प्रिय अभिभावक, आत्मीय 'आदरणीय भाईसाहब' की आत्मा को श्रीगुरुचरणों में विश्रांति मिले, ऐसी प्रार्थना की।


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