आंतरिक गुणों को परिमार्जित करने का महापर्व नवरात्र-डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी

Published on 2017-09-27
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हरिद्वार २७ सितम्बर।

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी ने कहा कि नवरात्र साधना साधक के आंतरिक गुणों को परिमार्जित करने का महापर्व है। इन दिनों मनोयोगपूर्वक की गयी साधना से साधक के पूर्व जन्मों के दोषों का नाश होता है, तो वहीं उसका भविष्य का मार्ग भी सुगम होता है।

डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी नवरात्र साधना के सातवें दिन गायत्री तीर्थ शांतिकुंज के मुख्य सभागार में आयोजित सत्संग में उपस्थित साधकों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीव कर्म के बंधन से बँधे हैं। उन्हें इनसे मुक्ति के लिए उच्च स्तरीय जप, तप की आवश्यकता होती है। ऋषि-मुनियों ने भी जप, तप के माध्यम से स्वयं के साथ-साथ अपने शिष्यों का मार्गदर्शन करते हुए उनके अंदर के गुणों को परिमार्जित किया है। साथ ही उनके अंदर पीड़ितों की निःस्वार्थ सेवा के लिए भाव पैदा किये हैं। इसी तरह गायत्री परिवार के संस्थापक युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने साधना के माध्यम से लाखों-करोड़ों के जीवन में गुणात्मक परिवर्तन के साथ राष्ट्र धर्म निबाहने के लिए प्रेरित किया है।

डॉ. चिन्मयजी ने कायिक, वाचिक, मानसिक, कर्षण, अयाचित, गव्यकल्प आदि बारह प्रकार के तप की व्याख्या करते हुए कहा कि इन तप, साधना के माध्यम से पूर्व जन्म में किये पापों का क्षय होता है तथा वर्तमान से लेकर भविष्य का मार्ग सुगम होता है। जप, तप के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हुए कहा कि जाग्रत तीर्थ परिसर व सद्गुरु के सान्निध्य में की गयी साधना पुण्यदायी होती है। इससे पूर्व डॉ. ओ.पी.शर्मा, श्री कालीचरण शर्मा, डॉ. गायत्री शर्मा, श्री श्याम बिहारी दुबे, श्री नमोनारायण पाण्डेय आदि वरिष्ठजनों ने विभिन्न विषयों पर साधकों का मार्गदर्शन किया।

यहाँ बताते चलें कि इन दिनों नवरात्र साधना के लिए देश के कोने-कोने से हजारों साधक गायत्री तीर्थ पहुँचे हैं। सभी साधक राष्ट्रोत्थान के लिए अपने अनुष्ठान का एक अंश नियोजित करते हैं। शांतिकुंज में साधकों की दिनचर्या प्रातःकाल साढ़े तीन से लेकर रात्रि नौ बजे तक है। इस बीच निर्धारित जप के साथ त्रिकाल संध्या भी साधक करते हैं। इस अवसर पर संस्कार प्रकोष्ठ के प्रभारी पं. शिवप्रसाद मिश्र, जोनल समन्वयक श्री गंगाधर चौधरी सहित अंतेवासी कार्यकर्त्ता एवं साधकगण उपस्थित रहे।

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