Published on 2017-10-25
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मैसूर। कर्नाटक

योग एक विज्ञान है, जीवन जीने की कला है। आज सारे विश्व में योग की प्रतिष्ठा बढ़ रही है। इसमें मानवीय बुद्धि को परिष्कृत कर परस्पर सामंजस्य स्थापित करने की अकूत क्षमता है। योग विश्व को जोड़ सकता है। यह भविष्य का धर्म है।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति माननीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने यह विचार मैसूर में आयोजित 'यौगिक विरासत का अंतर्राष्ट्रीय उत्सव' में व्यक्त किये। दक्षिण के लोकप्रिय योगाचार्य श्वांसा गुरु स्वामी वचनानंद जी महाराज द्वारा ३ से ८ अक्टूबर २०१७ की तारीखों में यह सम्मेलन आयोजित था। आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी और श्रीश्री रविशंकर जी ४ अक्टूबर के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित थे। यह कार्यक्रम सम्मेलन के संरक्षक माननीय जगद्गुरु शिवरात्रेश्वर जी के मैसूर स्थित आश्रम में आयोजित था।

आदरणीय डॉ. साहब एवं श्रीश्री रविशंकर जी का योग महोत्सव में पहुँचने पर दक्षिण भारत की परम्परा के अनुरूप भव्य स्वागत किया गया। उत्तरीय ओढ़ाकर, पुष्पवर्षाकर और स्मृति चिह्न प्रदान कर उनका सम्मान किया गया। दोनों ने वर्तमान वैश्विक संदर्भों में योग की उपयोगिता पर मार्मिक उद्बोधन दिये।

आदरणीय डॉ. साहब ने कहा कि योग के माध्यम से जीवन शैली के दोष दूर किये जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि मैं उन लोगों में से हूँ जो देश की शिक्षा नीति में बदलाव चाहते हैं। हमारे देश की शिक्षा नीति को नैतिक मूल्य एवं अध्यात्म विज्ञान पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने अपने विश्वविद्यालय में इस दिशा में किये जा रहे प्रयोगों की जानकारी दी और उन्हें जगद्गुरु शिवरात्रेश्वर जी द्वारा संचालित लगभग ३०० शिक्षण संस्थाओं में भी लागू करने का आह्वान किया। इस अवसर पर देश- विदेश के हजारों प्रतिष्ठित योगाचार्य उपस्थित थे।


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