देसंविवि के प्रयासों से बढ़ते भारत और लिथुआनिया के संबंध

Published on 2017-12-08

डॉ. चिन्मय पण्ड्या, प्रतिकुलपति देव संस्कृति विश्वविद्यालय के बाल्टिक देशों के प्रवास से बनी नई संभावनाएँ

एशिया का एकमात्र बाल्टिक केन्द्र देव संस्कृति विश्वविद्यालय में स्थापित है। यहाँ दोनों देशों की संस्कृति की समानताओं के शिक्षण और अनुसंधान का कार्य हो रहा है। प्रस्तावित लिथुआनिया के शिक्षा मंत्रालय की अभिनव पहल इस केन्द्र के माध्यम से दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंधों को प्रगाढ़ करने, सहयोग एवं विनिमय बढ़ाने बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।

दो प्रतिष्ठित अनुदान
इरेस्मस अनुदान

विनियस विश्वविद्यालय के प्रो. व्यतिस, निदेशक प्राच्य विद्या अध्ययन केन्द्र के साथ मुलाकात हुई। इसमें इरेस्मस अनुदान के लिए संयुक्त रूप से आवेदन करने पर सहमति बनी। इरेस्मस अनुदान प्राप्त होने पर दोनों विश्वविद्यालयों के बीच संकाय सदस्यों के आदान- प्रदान की नयी संभावनाएँ बनेंगी।

शिक्षा मंत्रालय का सहयोग

लिथुआनिया के शिक्षा मंत्रालय ने विश्व के सभी बाल्टिक केन्द्रों को ६ वर्षों के लिए अनुदान प्रदान करने का प्रस्ताव रखा है। उल्लेखनीय है कि एशिया का एकमात्र बाल्टिक केन्द्र देव संस्कृति विश्वविद्यालय में स्थापित है। इस संदर्भ में विनियस विश्वविद्यालय के प्रति कुलाधिसचिव प्रो. जेस्कुनास तथा डॉ. गिना हॉलेक से चर्चा हुई। उन्होंने भारत और बाल्टिक देशों के सांस्कृतिक संबंधों को प्रगाढ़ करने के लिए देसंविवि के प्रयासों को सराहा और प्रस्तावित अनुदान के लिए समस्त विवरण डॉ. पण्ड्या जी से प्राप्त किये। निकट भविष्य में देव संस्कृति के वैश्विक विस्तार के क्रम में यह एक महत्त्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।

देसंविवि आयेंगे लिथुआनियन कल्चरल इंस्टीट्यूट के सदस्य
लिथुआनिया की संस्कृति, इतिहास, भाषा और परम्पराओं पर शोधकार्य के लिए समर्पित लिथुआनियन कल्चरल इंस्टीट्यूट के निदेशक से मुलाकात हुई। उन्होंने शोध कार्यों से जुड़े अपने कुल ७२ में से ६ संकाय सदस्यों को ६ सप्ताह के लिए संयुक्त शोध कार्यक्रमों के लिए देसंविवि के बाल्टिक सेंटर भेजने का मन बना लिया है।

वैदिक संस्कृति से हुआ है लिथुआनियाई संस्कृति का उद्भव
लथुआनियाई परम्पराओं की प्रमुख पुजारिन से चर्चा हुई। उनका दृढ़ विश्वास है कि सम्पूर्ण लिथुआनियाई संस्कृति का जन्म वैदिक संस्कृति से हुआ है। लिथुआनिआ में प्रत्येक शुभ कार्य के पूर्व अग्नि पूजा की परम्परा है। अग्निपूजा को वे भी बहुत पवित्र मानते हैं। प्रमुख पुजारिन का मानना है कि यह भी भारतीय यज्ञ परम्परा से ही प्रेरित है।


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