युगऋषि के अवतरण का उद्देश्य समझें

Published on 2018-01-20
img

उनसे जुड़ने के सौभाग्य को पहचानें,
युग निर्माण आन्दोलन में भागीदारी के लिए साहसी कदम बढ़ायें

भारतीय आध्यात्मवाद का ज्ञानपक्ष तो देखने, सुनने को
मिलता है, पर विज्ञानपक्ष एक प्रकार से लुप्त ही हो गया।
कथा- प्रवचनों, सम्मेलनों अथवा धर्म- साहित्य के माध्यम
से हमें ज्ञानपक्ष की यत्किंचित जानकारी मिलती रहती है।
यह विचार- संशोधन की दृष्टि से उत्तम है।
 इससे दोष-दुर्गुणों को छोड़ने और सज्जनोचित गतिवविधियाँ अपनाने
में सहायता मिलती है। इस पक्ष का भी अपना स्थान है,
पर महत्त्वपूर्ण प्रयोजन केवल विचार मात्र से सम्भव नहीं
हो सकते, उनके लिए आवश्यक शक्ति चाहिए। सांसारिक
प्रयोजनों मे धन- बल, बुद्धि- बल, जल- बल एवं अभीष्ट
परिस्थितियों तथा उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है।
केवल सोचने या जानने भर से कोई प्रगति या उपलब्धि
नहीं होती।
सूक्ष्म- जगत को, जन- मानस को प्रभावित करने
एवं आपत्तियों में प्रतिकूलताओं को सुविधाओं तथा
अनुकूलता में बदलने के लिए प्रचण्ड आत्म- बल चाहिए
और उसे तपश्चर्या के अखाड़े में पाया, बढ़ाया जा सकता
है। अभी बहुत काम करना बाकी है। ज्ञान- यज्ञ व नव
िनर्माण आन्दोलन की मशाल जलाकर दूसरे मजबूत
हाथों में थमाते हुए हम पूरा और पक्का विश्वास करते हैं
कि अनैतिकता, असामाजिकता और अदूरदर्शिता से भरी
वर्तमान परिस्थितियाँ देर तक न टिक सकेंगी। युग- निर्माण
का महान आन्दोलन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संसार के
हर व्यक्ति को प्रभावित करेगा, झकझोरेगा, उठाकर खड़ा
करेगा और जो उचित, वाञ्छनीय तथा विवेकपूर्ण है, उसे
ही अपनाने को बाध्य करेगा।

नया युग प्रात:काल के उदीयमान सूर्य की तरह
अपनी अरुणिमा अब कुछ ही समय में प्रकट करने जा
रहा है। एक अभिनव आन्दोलन को जन्म देकर, उसमें
गति भरकर उस मोर्चे की कमान मजबूत योद्धाओं के हाथों
में सौंपकर हम जा रहे हैं। नये- नये शूरवीर इस मुहीम
पर आते चले जायेंगे और युग निर्माण की प्रगति अपनी
निर्धारित गति से सुव्यवस्थित क्रमबद्धता के साथ अग्रगामी
होती रहेगी।
इस बीच महती घटनाएँ घटेंगी, भारी संघर्ष होंगे,
पाप बढ़ेगा और उसकी प्रतिक्रिया नये सिरे से सोचने और
नयी रीति- नीति अपनाने के लिए जन- साधारण को विवश
कर देगी। बदलाव के अतिरिक्त और कोई मार्ग न रहेगा।
है तथा इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए लोकनायकों की जो
एक विशाल सेना उमड़ती चली आ रही है, उसे आवश्यक
बल, साहस तथा साधन उपलब्ध कराने का काम शेष है।
अभीष्ट शक्ति के बिना वे भी क्या कर सकेंगे? सो उनके
लिए अभीष्ट शक्ति जुटाने को अधिक महत्त्वपूर्ण समझकर
हमें उसके लिए लगाना पड़ेगा।

आज का लोकनेतृत्व बहुत दुर्बल है। राजनीति,
समाज तथा धर्म के सभी क्षेत्रों में ऐसा नेतृत्व दीख
नहीं पड़ता, जो जन- मानस को हिलाकर रखने
और अपनी प्रखरता के बल पर लोगों को अपनी
गतिविधियाँ बदलने के लिए प्रभावित तथा विवश
कर सके। वाचालता, लोकेषणा और छल- छद्म का
आधार लेकर चलने वाले स्वार्थी और संकीर्ण स्तर
के लोग अवांछनीयता को बदल सकने में समर्थ
नहीं हो सकते। वे अपने लिए धन, यश तथा पद
कमा सकते हैं, पर आन्तरिक प्रखरता के बिना युग-
परिवर्तन की आवश्यकता पूर्ण नहीं की जा सकती।
परिस्थितियों की माँग है कि हर क्षेत्र में प्रखर नेतृत्व
का उदय हो। यह आत्मबल की प्रचुरता से ही सम्भव
हो सकता है। इस अभाव की पूर्ति करना भी हमारी
अगली तपश्चर्या का एक प्रयोजन है।

कुछ समय बाद हम एक अति प्रचण्ड तपश्चर्या के
लिए अविज्ञात दिशा में प्रयाण करने वाले हैं। उसका एक
उद्देश्य एक ऐसे लोकसेवी वर्ग का उद्भव करना है, जो
अपने चरित्र, व्यक्तित्व, आदर्श, प्रभाव से ऐसे लोकनेतृत्व
की अभाव- पूर्ति कर सके। इन दिनों महापुरुषों की बड़ी
शृंखला अवतरित होनी चाहिए, जो युग परिवर्तन की
महान संभावनाओं को साकार कर सके।

गंगा का अवतरण कठिन न था, कठिनाई भगीरथ
के उत्पन्न होने में थी। मनुष्य महान है। उसमें महानता की
अभीष्ट मात्रा प्रकट हो सके तो वह सच्चे अर्थों में भगवान
का पुत्र और प्रतिनिधि सिद्ध हो सकता है। अगले दिनों ऐसे
भगीरथों की आवश्यकता पड़ेगी, जो संसार का कायाकल्प
करने और शांति की सुरसरि का अवतरण बना सकने में
समर्थ तथा सफल हो सकें।

हमारी आगामी तपश्चर्या का प्रयोजन संसार के हर
देश में, जन- जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भगीरथों का सृजन
करना है। उनके लिए अभीष्ट शक्ति- सामर्थ्य का साधन
जुटाना है। रसद और हथियारों के बिना सेना नहीं लड़
सकती। नव- निर्माण के लिए उदायमान नेतृत्व के लिए पर्दे
के पीछे रहकर हम आवश्यक शक्ति तथा परिस्थितियाँ
उत्पन्न करेंगे। अपनी भावी प्रचण्ड तपश्चर्या द्वारा यह
सम्भव हो सकेगा और कुछ ही दिनों में हर क्षेत्र में, हर
दिशा में सुयोग्य लोकसेवक अपना कार्य आश्चर्यजनक
कुशलता तथा सफलता के साथ करते दिखाई पड़ेंगे। श्रेय
उन्हीं को मिलेगा और मिलना चाहिए।

युग- निर्माण आन्दोलन संस्था नहीं, एक दिशा
है। सो अनेक काम लेकर इस प्रयोजन के लिए अनेक
संगठनों तथा प्रक्रियाओं का उदय होगा। भावी परिवर्तन
का श्रेय युग- निर्माण आन्दोलन को मिले, यह
आवश्यक नहीं। अनेक नाम- रूप हो सकते हैं और
होंगे। उससे कुछ बनता- बिगड़ता नहीं। मूल प्रयोजन
विवेकशीलता की प्रतिष्ठापना और सत्प्रवृत्तियों के
अभिवर्द्धन से है। सो हर देश, हर समाज, हर धर्म
हर क्षेत्र में इन तत्त्वों का समावेश करने के लिए
अभिनव नेतृत्व का उदय होना आवश्यक है। हम
इस महती आवश्यकता की पूर्ति के लिए अपने शेष
जीवन में उग्र तपश्चर्या का सहारा लेंगे। उसका स्थान
और स्वरूप क्या होगा, यह तो हमारे पथ- प्रदर्शक को
बताना है, पर तपश्चर्या के दो प्रयोजनों में से एक उपर्युक्त है,
जिसके लिए हमें सघन जन- सम्पर्क छोड़कर नीरवता की
ओर कदम बढ़ाने पड़ रहे है।



Write Your Comments Here:


img

अजरबेजान में योग और यज्ञ विज्ञान का विस्तार

योग दिवस पर देसंविवि प्रतिनिधि को मिला विशेष आमंत्रणबाकु। अजरबेजानअजरबेजान की राजधानी बाकु में चौथा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने के लिए देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि को विशेष रूप से आमंत्रित किया। शांतिकुंज प्रतिनिधि श्री जयराम मोटलानी वहाँ पहुँचे और.....

img

मॉरिशस में गायत्री चेतना केन्द्र के लिए भूमिपूजन हुआ

लोंग माउण्टेन। मॉरिशसशांतिकुंज से मॉरिशस पहुँची श्री बालरूप शर्मा, श्री हेमलाल तत्त्वदर्शी एवं श्री नागमणि शर्मा की टोली ने लोंग माउंटेण्टन में गायत्री जयंती पर्व अपूर्व उल्लास के साथ मनाया। पर्व पूजन के साथ गायत्री- गंगा का महत्त्व बताने वाले.....

img

विश्व को १४ नोबल पुरस्कार विजेता देने वाले शिक्षा केन्द्र यूनिवर्सिटी आॅफ ज्यूरिच, स्विटज़रलैण्ड के साथ संबंध स्थापित हुए

भारतीय विद्या पर कार्यक्रम चलाने की है योजनादेव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति जी स्विटजरलैण्ड की राजधारी ज्यूरिच पहुँचे। वहाँ यूनिवर्सिटी आॅफ ज्यूरिच के अधिकारियों के साथ उनकी बैठक हुई, जिसमें भारतीय विद्या पर कार्यक्रम चलाने पर चर्चा हुई। यह वहाँ.....