Published on 2018-02-20
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प्रशिक्षण के स्वरूप

• वरिष्ठों के उद्बोधन • आन्दोलनों के प्रारूप
• प्रस्तुतियाँ, समूह चर्चाएँ • कुशल प्रबंधन

माँ उमिया धाम के विशाल मैदान पर २६ से २८ जनवरी की तारीखों में लघु भारत के दर्शन हुए। प्रत्येक व्यक्ति में माँ भारती की आराधना की हूक थी। बिना किसी व्यक्तिगत लाभ और यश की कामना के उनमें देश के स्वस्थ्य विकास के लिए बढ़-चढ़कर योगदान देने का उत्साह था। युग सृजेता नगर में परम पूज्य गुरुदेव के सपनों के सतयुगी समाज के दर्शन हो रहे थे।
 
युग सृजेता संकल्प समारोह एक जीती-जागती पाठशाला थी। प्रशिक्षण के तीन स्वरूप वहाँ दिखाई दिये। तीन दिन में शांतिकुंज के कार्यकर्त्ताओं ने युगऋषि का संदेश सुनाते हुए नवयुग के हनुमानों में आत्मविश्वास  तथा युग निर्माणी संकल्प जगाने के लिए जामवंत की भूमिका भी निभाई, लेकिन सीखने-सिखाने के अधिकांश अवसर लीक से हटकर थे। कार्यक्रम में युग निर्माणी अग्रदूतों को अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का बेहतर अवसर मिला तो वहीं लगभग ९० प्रतिशत युवक-युवती ऐसे थे जो युवा क्रांति वर्ष २०१६-१७ के युवा जोड़ो अभियान से मिशन के संपर्क में आये थे। उन्हें पूरे भारत में गायत्री परिवार द्वारा चलायी जा रही रचनात्मक गतिविधियों को प्रत्यक्ष देखने और सीखने का अवसर मिला।  प्रशिक्षण का तीसरा आयाम था कार्यक्रम के प्रबंधन में दिखाया कौशल, कार्यकर्त्ताओं का मिशन के लिए समर्पण। यहाँ की व्यवस्थाएँ केवल कार्यक्रमों की दृष्टि से ही नहीं, स्वच्छता, शुचिता, सुव्यवस्था, शालीनता, श्रमशीलता, सद्भाव, सहकार का दैनंदिन जीवन में आत्मसात करने का सीधा-सीधा संदेश था। युग निर्माण योजना के अंतर्गत साधना, संस्कार, शिक्षा, स्वावलम्बन, नारी जागरण, सत्प्रवृत्ति संवर्धन-दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन और पर्यावरण आन्दोलन के माध्यम से जैसे सतयुगी समाज की संकल्पना परम पूज्य गुरुदेव ने की थी, युग सृजेता समारोह में वह प्रत्यक्ष दिखाई देता था।

सफलता का आधार प्रखर साधना

युवा क्रांति वर्ष २०१६-१७ का समापन अश्वमेध महायज्ञ जैसे एक महान अनुष्ठान की तरह सम्पन्न हुआ। इन दो वर्षों में देश की तरुणाई को जब एक विशेष अभियान के अंतर्गत उनकी जिम्मेदारियाँ सौंपीं तो उन्होंने ध्रुव, प्रहलाद, अर्जुन, हनुमान, भगतसिंह जैसे समर्पण और निष्ठा के साथ उन्हें गति देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। समापन समारोह 'युग सृजेता' की सफलता के लिए भी विराट साधना अभियान देशभर में चलाया गया। इसके अंतर्गत ४ करोड़ गायत्री महामंत्र जप एवं २ करोड़ मंत्र लेखन कराये गये थे।


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