Published on 2018-02-25

वैदिक ज्ञान की गहराई में निहित वर्तमान समस्याओं का समाधान : डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी
शोधपत्र की ई- प्रोसिडिग का हुआ विमोचन, संगोष्ठी में सत्रह पेपर पढ़े गये

हरिद्वार २५ फरवरी।
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय व इण्डियन काउन्सिल ऑफ फिलोसफिकल रिसर्च (आईसीपीआर) के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित च्वैदिक ज्ञान, सांस्कृतिक विरासत एवं समकालीन जीवनज्विषय पर आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आज समापन हो गया। इस शिविर में देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, गुरूकुल कांगड़ी विवि, पतंजलि विवि, उत्तराखंड संस्कृति विवि सहित देश के अन्य विश्वविद्यालयों के शोधार्थी, छात्र- छात्राओं ने अपने शोधपत्र पढ़े।

सत्र की अध्यक्षता कर रहे देसंविवि के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी ने कहा कि प्राचीन काल में शत्रु हमारे निकट दिखाई देने वाले होते थे, जिससे प्रत्यक्ष रूप से सावधान रहते थे। किन्तु आज वह वे हमारे चिंतन, चरित्र एवं जीवनशैली में घुस गये हैं। इनसे बचने के लिए भारतीय संस्कृति के वैदिक ज्ञान, उपनिषद आदि के सूत्रों को जीवन में उतरना होगा। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति ही एक ऐसी संस्कृति है, जिसके सूत्रों को अपनाकर सफलता की सीढ़ी चढ़ी जा सकता है। उन्होंने युवाओं को भारतीय संस्कृति के सूत्रों जीवन मे अपनाने के लिए प्रेरित किया।

आईसीपीआर के सचिव श्री रजनीश कुमार शुक्ला ने कहा कि आज विज्ञान और तकनीक के इतने विकास के बावजूद शांति नहीं है, क्योंकि हम वैदिक ज्ञान- विज्ञान, शास्त्र, संस्कृति आदि के मूल तत्व को भूला बैठे हंै। वर्तमान समय में इन विषयों पर गहन- चिंतन, चर्चा- परिचर्चा के साथ इसे अपने जीवन का अंग बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वैदिक ज्ञान समग्र ज्ञान की परंपरा है जिसमें सारे विरोधाभास तिरोहित हो जाते हैं। आज की समस्याओं, चुनौतियों का पूर्व समाधान इसमें निहित है।

इससे पूर्व देसंविवि के कुलपति श्री शरद पारधी ने कहा कि वेद सिर्फ ग्रंथ या किताब नहीं है, यह ज्ञान का प्रतीक है जो शुद्ध निर्मल हदय में प्रकट होता है और व्यक्ति के चिंतन- चरित्र एवं व्यवहार को पवित्र एवं प्रखर बनाता है।

द्वितीय सत्र में डॉ जयदेव वेदालंकार ने वैदिक ज्ञान- विज्ञान की सनातन अवधारणा पर प्रकाश डाला। वेदों में उल्लेख ब्राह्मण के मण्डलों, वेदों के गणितीय प्रयोग, गणितीय ज्योतिष, ग्रहों की स्थिति एवं सौर वर्षों की गणना पर विस्तृत जानकारी दी।

संगोष्ठी के समन्वयक प्रो. सुरेश वर्णवाल ने बताया कि दो दिवसीय संगोष्ठी में आईसीपीआर के नियमों के तहत चयनित कुल सत्रह पेपर पढ़े गये, जबकि विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोधरत ११० विद्यार्थियों ने अपने पेपर प्रस्तुत किये। समापन सत्र के अवसर पर शोधार्थी के शोधपत्र की ई- प्रोसिडिंग का विमोचन किया गया। इस दौरान पर गुरूकुल कांगड़ी विवि के योग विभागाध्यक्ष डॉ. ईश्वर भारद्वाज, प्रो. सुखनन्दन सिंह, डॉ. ज्ञानेन्द्र पाण्डेय, डॉ वन्दना श्रीवास्तव, डॉ. पीयूष त्रिवेदी, डॉ. इन्दु शर्मा, डॉ. गोविन्द मिश्र सहित अनेक विवि से आए शिक्षक, शोधार्थी एवं देसंविवि के छात्र- छात्राऐं मौजूद रहे।


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