भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन

Published on 2018-02-26

भारतीय संस्कृति में समाहित है वसुधैव कुटुंबकम की भावना : डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी
१ लाख १५ हजार ३२१ विद्यार्थियों की भागीदारी कराने वाला बांसवाड़ा जिला रहा देश भर में अव्वल
वर्ष २०१७ में १८ राज्यों के ३१ लाख छात्र- छात्राएँ रहे सम्मिलित

हरिद्वार २६ फरवरी।
गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा से जुड़े जिला समन्वयकों की दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आज समापन हो गया। इस संगोष्ठी में उ.प्र, म.प्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब सहित देश के १८ राज्यों के तीन सौ पचास जिलों के प्रतिनिधियों ने भागीदारी की।

संगोष्ठी को संबोधित करते हुए शांतिकुंज के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता श्री वीरेश्वर उपाध्यायजी ने कहा कि कोई कठिन कार्य पर ऊँची मानसिकता वाले कहते हैं कि प्रतिभा का ऑकलन का यह एक सुअवसर है, जबकि कमजोर मानसिकता वाले इसे बचने का उपाय ढूंढ़ते हैं। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी ने कहा कि भारत ने संस्कृति रूपी जीवन शैली, पारिवारिकता के रूप में विश्व को अजस्र अनुदान दिया है। भारतीय संस्कृति हमारी मानव जाति के विकास का उच्चतम स्तर कही जा सकती है। इसकी परिधि में सारे विश्व राष्ट्र के विकास के- वसुधैव कुटुंबकम के सभी सूत्र समाहित हैं। उन्होंने कहा कि परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने भारतीय संस्कृति की कुछ मान्यताओं पर बड़ी गहराई से प्रकाश डाला है व प्रत्येक का तथ्य सम्मत विवेचन शास्त्रों व विज्ञान की सम्मति के साथ प्रस्तुत किया है। श्री एचपी सिंह ने भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के आगामी वर्ष के नियमों एवं कार्यक्रम निर्धारण पर विस्तृत जानकारी दी।

भासंज्ञाप के प्रभारी श्री प्रदीप दीक्षित ने बताया कि इस संगोष्ठी में भासंज्ञाप से जुड़े देश के १८ प्रांतों के तीन सौ पचास जिला समन्वयकों की भागीदारी रही। इस दौरान आगामी वर्ष में होने वाली परीक्षा के निर्धारण एवं भावी योजनाओं पर विस्तृत चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि वर्ष २०१७ में देश के १८ राज्यों हुए भासंज्ञाप में ३१ लाख छात्र- छात्राओं ने भाग लिया। इसमें सबसे ज्यादा १ लाख १५ हजार ३२१ विद्यार्थियों की भागीदारी कराने वाले बांसवाड़ा राजस्थान सहित प्रथम दस जिलों के जिला प्रतिनिधियों को विशेष स्मृति चिह्न भेंटकर सम्मानित किया गया।


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