Published on 2018-03-16
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अगले चरण के दायित्व सँभालने के लिए शक्ति संवर्धन साधना जरूरी है

लक्ष्य के अनुरूप स्तर
नवरात्र पर्व को शक्ति साधना का विशिष्ट पर्व माना जाता है। सभी आस्तिक श्रद्धालुजन इस अवधि में कुछ विशेष जप, तप, साधना करने के लिए प्रयास करते हैं। गायत्री परिवार के परिजनों को युगऋषि के अनुग्रह से यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है कि मंत्रों में सर्वश्रेष्ठ मंत्र, गायत्री महामंत्र की साधना सहज क्रम में होने लगी है। नवरात्र पर्व पर व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तरों पर साधना अनुष्ठान सम्पन्न किए जाते हैं। सहज जीवन क्रम में इस साधना के सत्परिणाम भी मिलते रहे हैं। लेकिन अब नवसृजन की दिव्य योजना में उच्च स्तरीय भागीदारी के लिए कुछ विशेष साधना पुरुषार्थ करने की अनिवार्यता हम सबके सामने है। उसे समझते हुए लक्ष्य के अनुरूप तैयारी करना जरूरी है।

शक्तिस्वरूपा वन्दनीया माताजी के जन्म और युगऋषि के जीवन्त संकल्प की प्रतीक अखण्ड ज्योति के प्रज्वलन की शताब्दी सन् २०२६ में मनाने की घोषणा की जा चुकी है। तब तक इस देव परिवार के सृजन सैनिकों को नवसृजन के प्रत्यक्ष अभियान को इतना समर्थ बनाना है कि मनुष्य मात्र के उज्ज्वल भविष्य की सुनिश्चित संभावना की झलक जन सामान्य को भी मिलने लगे।

यह बात सत्य है कि युगाधिपति महाकाल एवं ऋषितंत्र की समर्थ सत्ता तूफानी गति से परिवर्तन चक्र चला रही है, किन्तु उसके लिए आवश्यक स्थूल गतिविधियों को स्वरूप देने की जिम्मेदारी संकल्पित सृजन सैनिकों, सृजन शिल्पियों के कंधे पर भी है, जिसे हर हालत में पूरा किया जाना है। राष्ट्र और विश्व के हर क्षेत्र में, मनुष्यों के हर वर्ग में जाग्रत आत्माओं तक नवसृजन संदेश पहुँचाने, उन्हें वाञ्छित प्रेरणा- प्रशिक्षण, प्रोत्साहन देकर नवसृजन प्रयोजनों में प्रवृत्त करने की क्षमता और कुशलता युग सैनिकों को विकसित करनी है। कार्य के अनुरूप 'शक्ति संवर्धन साधना' जरूरी हो गयी है। इसीलिए इस वर्ष को शक्ति संवर्धन साधना वर्ष' के रूप में प्रयुक्त करने का संकल्प उभरा है। इस वर्ष की यह पहली नवरात्र है। इसका भरपूर उपयोग करके सामने खड़ी चुनौतियों को पार करने के लिए समुचित शक्ति संवर्धन के प्रयोग करने की जरूरत है।

उच्चतर आयामों में प्रवेश करें

गायत्री साधना को सर्वश्रेष्ठ साधना कहा गया है। यह बड़ी समर्थ साधना है। वेद (अथर्ववेद) में यह सुनिश्चित घोषणा की गई है कि गायत्री के साधक को इस भूलोक में आयु, प्राण, प्रजा, पशु, यश और धन- सम्पदा आदि की प्राप्ति तो होती ही है, साथ ही सर्वश्रेष्ठ विभूति 'ब्रह्मवर्चस' की उपलब्धि भी होती है। इस लोक का जीवन क्रम समाप्त होने पर यह वेदमाता गायत्री साधक को उच्चतम लोक 'ब्रह्मवर्चस' तक भी पहुँचा देती है। इतना बड़ा और सुनिश्चित आश्वासन वेदवाणी में और किसी साधना को नहीं दिया गया है।

युगऋषि ने अपने जीवन की प्रयोगशाला में गायत्री महाशक्ति के प्रभावों को भली प्रकार परखा है और उन्हें घोषित स्तर से जरा भी कम नहीं पाया है। लेकिन उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि इसके लिए साधना को उच्चतर आयामों में प्रविष्ट कराना पड़ता है।

पूज्य गुरुदेव यह समझाते रहे हैं कि मंत्र की शक्ति किसी अच्छे कारतूस की तरह होती है। कारतूस को यदि पत्थर की तरह फैंक कर या गुलेल से मारा जाय तो उसका प्रभाव उस वजन के पत्थर जितना ही होगा। कारतूस के अन्दर भरी बारूद में विस्फोट होने पर गोली शब्द की गति से भी तेज गति से प्रहार करती है। गोली कितनी शक्ति से छूटेगी, यह बात उसे दागने वाली बन्दूक की नाल पर निर्भर करता है। बन्दूक से कारतूस के अन्दर की बारूद में विस्फोट किया जाता है। विस्फोट से पैदा हुई शक्ति को, गैस के दबाव को कहीं से रिसने (लीक होने) नहीं दिया जाता। वह दबाव गोली को नाल में तीव्र गति से ठेलता है। नाल की लम्बाई या गहराई के अनुपात से गोली की गति बढ़ती है। नाल की दिशा में ही गोली प्रहार करती है। प्रामाणिक कारतूस को किसी प्रामाणिक बन्दूक से दागा जाता है, तभी उसका वाञ्छित प्रभाव प्रकट होता है।

मंत्र कारतूस की तरह होता है और साधक का अंत:करण बन्दूक की तरह काम करता है। दूसरे शब्दों में कहें तो मंत्र का प्रभाव प्रकट करने के लिए साधक को अपना अंत:करण प्रामाणिक बन्दूक की तरह विकसित और प्रयुक्त करना पड़ता है। मंत्रशास्त्र ने इसी तथ्य को अपने ढंग से व्यक्त किया है।

शास्त्रमत : मंत्रशास्त्र में शब्दशक्ति के- मंत्र के दो आयाम बतलाए गए हैं- १. वाक् और २. परावाक्

वाक् वह शब्द है जो जीभ या कंठ से बोला जाता है और कान से सुना जाता है। इससे शब्द के अर्थ का बोध होता है और उसके साथ जुड़ा रूप या प्रसंग स्मृति पटल पर उभर आता है।

परावाक् शब्द या मंत्र का यह आयाम अन्त:करण की भावना के, ज्ञान और इच्छा के रूप में अवस्थित रहता है। यह शक्ति रूप में है। इसमें दिव्य प्रेरणा भरी होती है। सिद्धि इसी की अनुचरी है, मन इसी का सेवक है, चित्त इसी का पार्षद है। इसके सक्रिय- जीवन्त होने पर मन और बुद्धि को उसी धारा में लगना पड़ता है। मन, बुद्धि के साथ शरीर की क्रियाएँ भी उसी के अनुरूप बन जाती हैं।

हमारे जप- अनुष्ठान वाक् प्रयोग तक ही सीमित होकर रह गये हैं। परावाक् प्रयोग पर हमारा ध्यान कम ही जाता है। पूज्य गुरुदेव ने कहा और लिखा है कि जीभ से निकला शब्द कान तक ही पहुँचता है। उसके साथ मस्तिष्क की विचार शक्ति जुड़ती है तो वह सुनने वालों के विचारों को प्रभावित करती है। इसी प्रकार भावनापूर्वक हृदय की गहराई से निकली बात लोगों के हृदयों तक पहुँच जाती है। साधना में प्राण इसी परावाक् के सक्रिय होने से आते हैं। ब्रह्मवर्चस इसी के सहारे जाग्रत- विकसित होता है।

ब्रह्मवर्चस- ब्रह्मतेज जगाता है तो अपनी प्रकृति को, मन और इन्द्रियों की प्रवृत्तियों को परिष्कृत, अनुशासित बनाने में कठिनाई नहीं होती। उन सब की दिशा और गति दिव्य भावनाओं के अनुरूप होने लगती है। यही ब्रह्मवर्चस जब और सशक्त होता है तो यह बाह्य प्रकृति को भी अनुकूल बनाने में समर्थ हो जाता है। इसी के बल पर युगऋषि ने क्रुद्ध प्रकृति को शान्त करने का आश्वासन दिया। विनाश की धाराओं को विकास की दिशा में बलात् मोड़ने की बात कही।

मनुष्य की सत्ता में जो भी प्रकाशमान, दीप्तिमान अंश है, उसे दिव्य सत्ता का ही स्पंदन माना जाता है। यह स्पंदन ब्रह्म सत्ता से भी उभरते हैं और आत्म सत्ता से भी। आत्म सत्ता जब अपनी इच्छाओं, भावनाओं को परमात्म सत्ता से जोड़ती है तो एक दिव्य चक्र (सर्किट) बन जाता है। दोनों के स्पंदन एक- दूसरे के पूरक बन जाते हैं। मंत्रशक्ति से शोधित सधा हुआ अंत:करण जो स्पंदन पैदा करता है, वे परावाक् बन जाते हैं। परावाक् अपनी शुद्धता एवं प्रखरता के कारण ब्रह्म इच्छा के अनुरूप बन जाते हैं। उसके स्पंदन जगत के जीवाणुओं को स्पंदित करने लगते हैं। इस प्रकार मंत्र साधना से लोक प्रवाह की दिशाधारा बदलने लगती है। देवदूत, अवतारी महामानवों की यही कार्य पद्धति होती है। ईश्वर की इच्छा से जुड़ा इनका कर्त्तृत्व और इनकी इच्छा से जुड़ा ईश्वर का विधान अनुभव होने लगता है। मंत्र साधकों को चाहिए कि वे मंत्र साधना के इन सूक्ष्म आयामों में क्रमश: प्रविष्ट- सक्रिय होते रहें।

हमें प्रयास यह करना चाहिए कि अपने अनुष्ठानों में वाक् प्रयोग के साथ परावाक् विकास के संकल्प भी जोड़ें। हम इतनी संख्या में मंत्रजप करेंगे, यह वाक् प्रयोग का संकल्प हुआ। जप के दौरान हम इष्ट के प्रति गहन आत्मीयता के भाव उभारेंगे, गुरुसत्ता, इष्टसत्ता के दिव्य भावों के अनुरूप अपने भावों को, उनकी इच्छाओं के अनुरूप अपनी इच्छाओं को ढालेंगे, यह संकल्प मंत्र की परावाक् शक्ति को जाग्रत् कर सकते हैं। युगऋषि ने ध्यान निर्देशों में समर्पण- विसर्जन, एकत्व- अद्वैत आदि शब्दों का प्रयोग इसी परावाक् शक्ति को जगाने के निमित्त किया है।

मंत्रों का विज्ञान

मंत्रों में शास्त्र मत से दो तरह के मंत्र होते हैं,
१. अर्थक अर्थात् जिनके उच्चारित शब्दों के कुछ अर्थ निकलते हैं। विभिन्न नाम, गायत्री मंत्र, मत्युंजय मंत्र आदि इसी श्रेणी में आते हैं।
२. अनर्थक ऐसे मंत्र जिनके कोई अर्थ नहीं होते। इसके अन्तर्गत बीज मंत्र, ह्रीं, श्रीं, क्लीं, ऐं, हौं आदि आते हैं। इनकी ध्वनि मात्र से प्रभाव उभरते हैं।

इन दोनों ही प्रकार के मंत्रों के साथ वाक् और परावाक् प्रयोग समान रूप से फलित होते हैं। शुद्ध उच्चारण से वाक् प्रयोग पूरा होता है और उसके साथ जीवन्त भावना जुड़ने से परावाक् प्रयोग सधता है। निश्चित रूप से दोनों ही प्रकार के मंत्रों में परावाक् का विशेष महत्त्व होता है। अस्तु हर स्थिति में साधक के विचारों और भावनाओं को परिष्कृत करना अत्यंत आवश्यक होता है।

पूज्य गुरुदेव इस तथ्य पर बहुधा प्रकाश डालते रहते थे। कहते थे लोग यह पूछते हैं आपने किस माला से जप किया, किस आसन पर बैठे, मंत्र जप की गति क्या रहीं। यह नहीं पूछते कि आपने अपनी जीभ को, मन को कैसे अनुशासित बनाया। इच्छाओं, भावनाओं को इष्ट या गुरु के साथ कैसे मिलाया। मंत्र जप की सूक्ष्म प्रक्रिया को यह अंतरंग साधना ही सफल एवं प्रभावपूर्ण बनाती है।

मंत्रशक्ति को ध्वनि शास्त्र या संगीत शास्त्र के समकक्ष भी माना जा सकता है। राग विशेष के माध्यम से गीत के शब्दों के अर्थों को प्रभावपूर्ण बनाया जा सकता है। किन्तु वही राग यदि किसी वाद्ययंत्र में बजाया जाय तो भी उसका प्रभाव मनुष्यों, जीव- जन्तुओं और वनस्पतियों आदि पर पड़ता है।

मंत्रों की शक्तियाँ :
शास्त्रों में मंत्रों की चार शक्तियाँ बतायी गयी हैं।
१. प्रामाण्य शक्ति, २. फल प्रदान शक्ति, ३. बहुलीकरण शक्ति तथा ४. आयातयामता शक्ति।

१. प्रामाण्य शक्ति :
इसके अन्तर्गत मंत्रों के शब्दों में सन्निहित शिक्षा, सम्बोधन एवं आदेश आदि का समावेश होता है। गायत्री मंत्र को गुरुमंत्र उसकी इसी शक्ति के आधार पर कहा जाता है। युगऋषि ने इस शक्ति को जगाने के लिए जप के अतिरिक्त मंत्रार्थ पर चिन्तन मनन करने की आवश्यकता बताई है।

२. फलप्रदा शक्ति : यह शक्ति साधकों के मनोयोग, ब्रह्मचर्य, तप, आहार और भावना पर निर्भर होती है। उसी मंत्र की फलप्रदा शक्ति साधक की उक्त साधनाओं के आधार पर घटती- बढ़ती रहती है। जप के साथ तप को, संयम साधना को जोड़ने की बात इसी शक्ति को बढ़ाने के लिए कही जाती है। युगऋषि ने कहा है कि तुमने क्या खाया, क्या नहीं; क्या किया, क्या नहीं इससे ईश्वर को कोई मतलब नहीं। वहाँ तो यही देखा जाता है कि साधक की इन्द्रियों सहित मन- अंत:करण कितने अनुशासित हुए।

३. बहुलीकरण शक्ति : जैसे अग्नि में पड़ने पर घी या मिर्च का प्रभाव व्यापक क्षेत्र में फैल जाता है, गायक का भाव राग के साथ फैलकर सैकड़ों व्यक्तियों पर छा जाता है, वैसे ही साधक का भाव मंत्र के साथ गुँथ कर अनेक व्यक्तियों और प्रकृति घटकों को प्रभावित कर सकती है। पूज्य गुरुदेव ने इसके लिए आत्म विकास, आत्मीयता के विस्तार की आवश्यकता बतलाई है।

४. आयातयामता शक्ति : यह मंत्रों के विशिष्ट प्रयोगों से जागती है। किसी विशेष क्षमता सम्पन्न व्यक्ति द्वारा, विशेष स्थान पर, विशेष विधि- विधान के साथ की गयी मंत्रोपासना विशेष प्रयोजन सिद्ध करती है। परशुराम को परशु, विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि पद, शृंगी ऋषि द्वारा पुत्रेष्टि प्रयोग इसी शक्ति की देन कही जा सकती है। युगऋषि ने गायत्री के अमृत, पारस, कल्पवृक्ष, कामधेनु और ब्रह्मास्त्र प्रयोग की बात इसी संदर्भ में कही गयी है।

युग साधकों से

युगऋषि से जुड़े साधकों को अपनी साधना को युगधर्म के पालन की क्षमता विकसित करने की दिशा में प्रयुक्त करनी चाहिए। गुरुवर ने लिखा है कि कुछ विशेष करने की ठान लेना ही अनुष्ठान का मूल भाव होता है। ईश्वर के नवसृजन प्रयोजन में अपनी भूमिका बेहतर हो, यह भाव तो हर अनुष्ठानकर्त्ता के मन में होना ही चाहिए। गुरुदेव के अगले कार्य उच्च स्तर के हैं, हमारी साधनात्मक ऊँचाई या गहराई बढ़े, तभी उन्हें सम्पन्न कर पाना संभव होगा। युग साधकों को अब इस दिशा में संकल्पित प्रयास करने हैं।

नवरात्र साधना के क्रम में अधिक से अधिक व्यक्तियों को गायत्री उपासना एवं समूह साधना से जोड़ने के प्रयास अपनी जगह ठीक हैं। नये व्यक्तियों की श्रद्धा जगाकर उन्हें साधना की सुगम विधियाँ बताना ही उचित होता है। किन्तु पुराने साधक केवल संख्यापूरक जप करके ही अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री मान लें, यह ठीक नहीं। सामान्य उपासक भले ही लौकिक आकांक्षाओं की पूर्ति को लक्ष्य बनाकर साधना करें, किन्तु वरिष्ठ साधकों तो 'ब्रह्मवर्चस' का जागरण इस स्तर का करना चाहिए कि व्यक्तियों, परिवार एवं समाज को दुष्प्रवृत्तियों से मुक्त कराने और सत्प्रवृत्तियों में प्रवृत्त कराने का क्रम क्रांतिकारी गति से चल पड़े।


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