समर्पित शिष्य बनना है कठिन-डॉ. पण्ड्याजी

Published on 2018-03-17

देसंविवि में विद्यार्थियों की गीतामृत कक्षा में डॉ. पण्ड्याजी ने कहासमर्पित शिष्य बनना है कठिन

हरिद्वार १६ मार्च।

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि गुरु बनना समर्पित शिष्य बनने की अपेक्षा आसान है। शिष्यत्व की यात्रा मुश्किल है। आध्यात्मिक जीवन की, अंतर जगत की यात्रा के दौरान साधना के पथ पर अडिग रहना पड़ता है।

डॉ. पण्ड्या देसंविवि के मृत्युंजय सभागार में आयोजित गीतामृत की विशेष कक्षा को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर परीक्षा की तैयारियों के बीच मन की एकाग्रता को सृदृढ़ करने के लिए देसंविवि के हजार से अधिक युवा उपस्थित रहे।

कुलाधिपति डॉ. पण्ड्याजी ने कहा कि गुरु शिष्य परंपरा आध्यात्मिक प्रज्ञा को नयी पीढ़ियों तक पहुँचने का सोपान है। भारतीय संस्कृति में गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत गुरु अपने शिष्य को शिक्षा देता है। बाद में वही शिष्य गुरु के रुप में अन्य को शिक्षा देता है। उन्होंने कहा कि समर्पित व सच्चा शिष्य बनना गुरु बनने से कठिन है। शिष्यत्व धारण करने की यात्रा कठिन है। समर्पित शिष्य बनने के लिए स्वयं को गलाना और भट्टी में जलाना पड़ता है, यह आत्म परिष्कार एवं आत्म चिंतन, मनन से ही संभव है। उन्होंने कहा कि गुरु शिष्य के जीवन में रेगुलेटर की भांति काम कार्य करते हुए उसका मार्गदर्शन करता है। गुरु शिष्य का संबंध पिता और पुत्र की भांति भावनाओं एवं दृढ़ विश्वास पर टिका होता है। इसलिए शिष्य को सद्गुरु द्वारा सुझाये गये कार्यों- साधनाओं को निःस्वार्थ भाव से करना चाहिए। गुरु- शिष्य के संबंध द्रोणाचार्य एवं अर्जुन जैसा समर्पण एवं भावना होना चाहिए।

डॉ. पण्ड्याजी ने भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के ९ वें श्लोक के माध्यम से विद्यार्थियों में शिष्यत्व की यात्रा पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि अच्छे गुणों को अपनाने व उस पर निरंतर अडिग रहने से महान बना जा सकता है। इसके लिए नियमित रूप से अच्छे गुणों का चिंतन करें और उसका अनुपालन करते रहें।

इससे पूर्व संगीत के भाइयों ने बासुरी, सितार व अन्य वाद्ययंत्रों की धुन पर च्साधक का सविता को अर्पण....' गीत से प्रतिभागियों को शिष्यत्व भाव पैदा करने की ओर प्रेरित किया। कार्यक्रम के समापन से पूर्व डॉ. पण्ड्याजी ने युवाओं को ध्यान में गोता लगवाया। इस अवसर पर कुलपति श्री शरद पारधी, प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या, कुलसचिव श्री संदीप कुमार, समस्त विभागाध्यक्ष, छात्र- छात्राओं के अलावा शांतिकुंज व ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के अंतेवासी कार्यकर्त्ता उपस्थित रहे।

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