Published on 2018-03-20

हरिद्वार १९ मार्च।
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि मनुष्य जीवन ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार है। ईश्वर ने मनुष्य को षड् संपत्ति- शम, दम, उपरति, तितिक्षा, वैराग्य और विवेक समान रूप से दिया है। जो मनुष्य इसमें अधिकार पा लेता है, वही सर्वोच्च स्थान के हकदार होत है।

वे देसंविवि के मृत्युंजय सभागार में आयोजित नवरात्र साधना के अवसर पर उपस्थित युवाओं का मार्गदर्शन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मनुष्य को ऊँचा उठाने के लिए जिस तरह षड् संपत्ति है, उसी तरह उसे नीचे गिराने के लिए षट्रिपु- काम, क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि हैं। जो मनुष्य षट रिपु पर नियंत्रण पा लेता है, उसका प्रगति दर प्रगति होता है।

कुलाधिपति ने कहा कि साधना के संकल्प, संवेदना और सद्गुण इन तीनों के साथ जो मनुष्य बढ़ता है, वही सच्चे अर्थों में ईश्वर का प्रिय होता है और सभी स्थानों पर पूूजा भी जाता है। उन्होंने इन राहों पर युवाओं को संकल्प के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि नवरात्र ऐसे ही संकल्प को जगाने व परिपुष्ट करने के लिए आता है। इन दिनों पूर्णर् मनोयोग के साथ साधना करने से लाभ ही लाभ प्राप्त होता है। कुलाधिपति ने गीता, रामचरित मानस आदि ग्रंथों के उद्धरणों के माध्यम से ऊँची से ऊँची स्थिति में पहुँचने हेतु विभिन्न सूत्र सूझाये।

इससे पूर्व संगीत विभाग के भाइयों ने 'हमें शक्ति दो माँ, सतत साधना की तपन माँगते हैं......' गीत से उपस्थित जनसमुदाय को भक्ति के रंग में डूबो दिया। समापन से पूर्व विद्यार्थियों ने रामचरित मानस की आरती कर नवरात्र साधना की सफलता की कामना की। इस अवसर पर कुलपति श्री शरद पारधी, प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी, कुलसचिव श्री संदीप कुमार सहित विभागाध्यक्ष, विद्यार्थीगण व शांतिकुंज, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के अंतेवासी कार्यकर्ता, देश- विदेश से आये साधक उपस्थित रहे।


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