Published on 2018-03-24
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देसंविवि में नवरात्र साधना में जुटे साधकों से डॉ. पण्ड्याजी ने कहा वैराग्य से मत्सर पर विजय प्राप्त की सकती है

हरिद्वार २४ मार्च।

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि संयम का सीधा संबंध मन से है। मन पर इतना शासन या काबू हो कि जब चाहे मन से इच्छित काम लिया जा सके। मन का साम्राज्य अनंत है, उसे पराजित करना आसान नहीं है।

वे देसंविवि में युवाओं को साधना के विभिन्न पक्षों पर मार्गदर्शन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वैराग्य से मत्सर पर विजय प्राप्त की सकती है, जो व्यक्ति वैराग्य को पा लेता है, उसके अंतःकरण में ईश्वर प्रेम बढ़ने लगता है। वैरागी के लिए प्रकृति भी कोमल हो जाती है। इसे ग्रहण करने के बाद मनुष्य के मन की चंचलता समाप्त हो जाती है। उन्होंने कहा कि स्थिर वैराग्य से ही मनुष्य को विवेक जाग्रत होता है तथा मनुष्य को सद्बुद्धि प्राप्त होती है। यह चेतना को परिष्कृत करने का साधन है।

युवाओं के शंका समाधान करते हुए कुलाधिपति डॉ. पण्ड्याजी ने कहा कि साधक के लिए मत्सर (ईर्ष्या) का होना सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है। यह भाव उसे मानवीय सम्पदाओं को छोड़ भौतिकवादी प्रतिस्पर्धा करने की ओर प्रेरित करता है। जबकि साधक को इन रिपुओं को दूर रहना चाहिए। उन्होने कहा कि ईर्ष्या मनुष्य के मन को चंचल बनाती है और इच्छाओं को बढ़ाती है। ईर्ष्या के कारण व्यक्ति की दूसरों के साथ दूरियाँ बढ़ने लगती हैं। मत्सर में पड़ा व्यक्ति अपनी कमजोरियां छुपाने के लिए बहाने बनाता है और सत्य से भागता है और कर्तव्यों को भूल जाता है।

रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने भरत का उदाहरण देते हुए कहा है कि वे हर आकर्षण से परे थे, तभी उनके समक्ष अनेक चुनौतियां आईं, फिर भी वे अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से पालन किया। उन्होंने कहा कि नवरात्र साधना रिपुओं से बचाये रखने के लिए ऋषि प्रणीत विधा है। इसे हरेक व्यक्ति को अपनाना चाहिए।

इस अवसर पर देसंविवि, शांतिकुंज व ब्रह्मवर्चस शोध परिवार के अलावा देश- विदेश से आये सैकड़ों साधक उपस्थित रहे।


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