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 मंगलवार तक ग्यारह दल विभिन्न क्षेत्रों के लिए भेज चुका है - निकटवर्ती गाँवों का सर्वे कर पीड़ितों को राशन, कपड़े, बर्तन आदि सहयोग:
  

शांतिकुंज प्राकृतिक आपदा से पीड़ित लोगों की दशा से काफी आहत हैं। इसलिए एक-एक करके मंगलवार तक ग्यारह दल विभिन्न क्षेत्रों के लिए भेज चुका है। इनमें एक दल मंगलवार को राहत सामग्री कपड़े, राशन व बर्तन आदि लेकर केदारघाटी तथा दूसरा राहत दल मुनस्यारी के लिए रवाना हुआ। इसे  वरिष्ठ कार्यकर्त्ता श्री केसरी कपिल ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।

१६ सदस्यीय इस दल का नेतृत्व श्री घनश्याम देवांगन कर रहे हैं। इस दल का बेस कैम्प गुप्तकाशी होगा। ज्ञात हो कि इससे पूर्व एक दल केदारघाटी के लिए ३०जून को रवाना हुआ, जो वहाँ अपना काम बखूबी कर रहा है। श्री देवागंन का दल उस टीम में शामिल होकर निकटवर्ती गाँवों के ग्रामीणों को राशन, कपड़े, बर्तन आदि के किट देगा। शांतिकुंज आपदा प्रबंधन के प्रभारी श्री गौरीशंकर शर्मा के अनुसार एक किट में चावल व आटा ५-५ किग्रा, दाल, चीनी, शक्कर एक-एक किग्रा आदि अन्य खाद्य सामग्री तथा बर्तन में थाली, कटोरा, भगौना आदि घरेलु प्रयोगार्थ बर्तन शामिल हैं। इसके अलावा ग्रामीणों को कम्बल, साड़ी, पेंट शर्ट आदि कपड़े भी वितरित करेगा। 


    उन्होंने बताया कि एक दूसरा दल मुनस्यारी क्षेत्र के लिए ७ सदस्यीय दल कामता प्रसाद साहू के नेतृत्व में भेजा गया। इसका बैस कैम्प मुनस्यारी होगा, जहाँ से निकटवर्ती गाँवों का सर्वे कर पीड़ितों को राशन, कपड़े, बर्तन आदि सहयोगार्थ देंगे। श्री शर्मा ने बताया कि अब तक शांतिकुंज से २० ट्रक खाद्य सामग्री, ३००० राशन किट, एक ट्रक तिरपाल आदि पीड़ितों तक पहुंचाया गया है। इस कार्य में शांतिकुंज एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के एक हजार से अधिक स्वयंसेवक जुटे हैं।

    इससे पूर्व दोनों दल के सदस्यों को संस्था की अधिष्ठात्री शैल दीदी एवं गायत्री परिवार के मुखिया डॉ. प्रणव पण्ड्या ने पहाड़ी की दिनचर्या एवं परिस्थितियों से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि इस त्रासदी के समय पीड़ितों को खाद्य सामग्री से ज्यादा अपनों के बिछुड़ने का गम है, ऐसे लोगों को सांत्वना एवं ढाँढ़स दिलाने का भी काम करना है। उन्होंने दु:ख की इस घड़ी में उनकी मनोदशा को देखते हुए हरसंभव मदद करने की बात कही। उन्होंने बताया कि ऐसे ही एक बहिन गिरिडीह की सावित्री देवी यहाँ कुछ दिन पहले आई और मनोचिकित्सकीय उपचार से ठीक होकर गयी।







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