शक्ति संवर्धन की साधना करें, विशिष्ट श्रेय- सौभाग्य के अधिकरी बनें

Published on 2018-04-12
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शक्ति के अनुसार कार्य नहीं, कार्य के अनुरूप शक्ति अर्जन के संकल्प करें

समय की माँग
महाकाल की योजना के अनुसार ‘युग निर्माण’ की प्रक्रिया निरंतर तीव्रतर होती जा रही है। युगऋषि ने कहा है कि यह योजना विश्वव्यापी स्तर पर क्रियान्वित हो रही है। समाज की अलग- अलग आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समय- समय पर दैवी चेतना के प्रयोग होते रहे हैं। अब समग्र परिवर्तन के लिए सभी समस्याओं के हल तथा सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समग्र (एक मुश्त) व्यवस्था बनाई गई है। इसके लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष अनेक प्रकार की गतिविधियों को संचालित किया जा रहा है।

प्रत्यक्ष कार्य ‘प्रज्ञा परिवार’- गायत्री परिवार के संगठन के माध्यम से हो रहा है। इस अभियान के अन्तर्गत युगऋषि के प्रचण्ड तप और युग सैनिकों के सामूहिक साधना पुरुषार्थ के प्रभाव से सूक्ष्म जगत में भारी हलचल मची है। उसके कारण प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों स्तरों पर क्रान्ति के चरण उभरने और बढ़ने लगे हैं। युगऋषि ने कहा था कि ‘‘सन् 2000 के बाद क्रान्तियाँ जगह- जगह से फूट- फूट कर निकलेंगी।’’ हम देख रहे हैं कि क्रांतियाँ रेलगाड़ी के डिब्बों की तरह एक के पीछे एक दौड़ती चली आ रही हैं। राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तरों पर इस तथ्य को प्रत्यक्ष देखा- समझा जा सकता है।
बढ़ती जिम्मेदारी :- ऐसी स्थिति में अग्रदूतों की भूमिका निभाने वाले सृजन साधकों, सृजन सैनिकों की जिम्मेदारियाँ बढ़ने लगी हैं। समय के प्रवाह के विरुद्ध कोई भी प्रयोग प्रारंभ करना कठिन होता है। जिनके अन्दर संस्कारों की सम्पदा संग्रहीत होती है, वही प्रेरणा पाकर इस तरह के कार्यों का श्रीगणेश करते हैं। जब प्रारंभिक स्तर के कार्यों के लिए जन उत्साह उमड़ने लगता है तब दूसरी कठिनाई सामने आती है। किसी भी कार्य के प्रारंभिक चरण आसान होते हैं। वे होने लगे तो लोग उतने को ही पर्याप्त मानकर सीमित हो जाते हैं। अगले चरण का प्रारंभ करने के लिए अधिक सूझबूझ, साहस और कौशल की जरूरत पड़ती है।
युग निर्माण अभियान लगभग इसी स्थिति में है। युगऋषि की प्रेरणा से जाग्रत आत्माओं ने भावनाएँ, मान्यताएँ, विचारणाएँ, अपनी आंतरिक प्रवृत्तियाँ शुद्ध करने के लिए गायत्री विद्या का वरण और विस्तार किया। स्वार्थ से ऊपर उठकर परमार्थ के भाव से प्रयास- पुरुषार्थ करने की परम्परा ‘यज्ञीय’ आन्दोलन से प्रारंभ की। उसके प्रत्यक्ष- परोक्ष परिणाम दिखने लगे। अपने लिए स्वर्ग- मुक्ति की कामना से ऊपर उठकर सबके लिए सद्बुद्धि, सबके लिए उज्जवल भविष्य की भावना के साथ जप- तप, यज्ञादि के क्रम चल पड़े। अब गायत्री साधना को हंस वृत्ति विकसित करने वाली आत्म परिष्कार, आत्म विकास की जीवन साधना का रूप देना, यज्ञ को ‘इदं न मम’ के भाव से लोकमंगल के लिए प्रखर पुरुषार्थ के रूप में स्थापित करना जरूरी हो गया है। इसके लिए पहले की अपेक्षा अधिक शक्ति- कौशल की जरूरत है।
उधर देश- काल के अनुसार जगह- जगह से लोकहितकारी आन्दोलन उभर रहे हैं। उन सभी के पीछे कुछ संस्कारवानआत्माओं की भूमिका है। उन्हें भी यह बोध कराना जरूरी है कि वे कोई सामान्य सामाजिक आन्दोलन भर

महाकाल की योजना के अनुसार ‘युग निर्माण’ की प्रक्रिया निरंतर तीव्रतर होती जा रही है। युगऋषि ने कहा है कि यह योजना विश्वव्यापी स्तर पर क्रियान्वित हो रही है। समाज की अलग- अलग आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समय- समय पर दैवी चेतना के प्रयोग होते रहे हैं। अब समग्र परिवर्तन के लिए सभी समस्याओं के हल तथा सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समग्र (एक मुश्त) व्यवस्था बनाई गई है। इसके लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष अनेक प्रकार की गतिविधियों को संचालित किया जा रहा है।
प्रत्यक्ष कार्य ‘प्रज्ञा परिवार’- गायत्री परिवार के संगठन के माध्यम से हो रहा है। इस अभियान के अन्तर्गत युगऋषि के प्रचण्ड तप और युग सैनिकों के सामूहिक साधना पुरुषार्थ के प्रभाव से सूक्ष्म जगत में भारी हलचल मची है। उसके कारण प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों स्तरों पर क्रान्ति के चरण उभरने और बढ़ने लगे हैं। युगऋषि ने कहा था कि ‘‘सन् 2000 के बाद क्रान्तियाँ जगह- जगह से फूट- फूट कर निकलेंगी।’’ हम देख रहे हैं कि क्रांतियाँ रेलगाड़ी के डिब्बों की तरह एक के पीछे एक दौड़ती चली आ रही हैं। राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तरों पर इस तथ्य को प्रत्यक्ष देखा- समझा जा सकता है।

बढ़ती जिम्मेदारी :- ऐसी स्थिति में अग्रदूतों की भूमिका निभाने वाले सृजन साधकों, सृजन सैनिकों की जिम्मेदारियाँ बढ़ने लगी हैं। समय के प्रवाह के विरुद्ध कोई भी प्रयोग प्रारंभ करना कठिन होता है। जिनके अन्दर संस्कारों की सम्पदा संग्रहीत होती है, वही प्रेरणा पाकर इस तरह के कार्यों का श्रीगणेश करते हैं। जब प्रारंभिक स्तर के कार्यों के लिए जन उत्साह उमड़ने लगता है तब दूसरी कठिनाई सामने आती है। किसी भी कार्य के प्रारंभिक चरण आसान होते हैं। वे होने लगे तो लोग उतने को ही पर्याप्त मानकर सीमित हो जाते हैं। अगले चरण का प्रारंभ करने के लिए अधिक सूझबूझ, साहस और कौशल की जरूरत पड़ती है।
युग निर्माण अभियान लगभग इसी स्थिति में है। युगऋषि की प्रेरणा से जाग्रत आत्माओं ने भावनाएँ, मान्यताएँ, विचारणाएँ, अपनी आंतरिक प्रवृत्तियाँ शुद्ध करने के लिए गायत्री विद्या का वरण और विस्तार किया। स्वार्थ से ऊपर उठकर परमार्थ के भाव से प्रयास- पुरुषार्थ करने की परम्परा ‘यज्ञीय’ आन्दोलन से प्रारंभ की। उसके प्रत्यक्ष- परोक्ष परिणाम दिखने लगे। अपने लिए स्वर्ग- मुक्ति की कामना से ऊपर उठकर सबके लिए सद्बुद्धि, सबके लिए उज्जवल भविष्य की भावना के साथ जप- तप, यज्ञादि के क्रम चल पड़े। अब गायत्री साधना को हंस वृत्ति विकसित करने वाली आत्म परिष्कार, आत्म विकास की जीवन साधना का रूप देना, यज्ञ को ‘इदं न मम’ के भाव से लोकमंगल के लिए प्रखर पुरुषार्थ के रूप में स्थापित करना जरूरी हो गया है। इसके लिए पहले की अपेक्षा अधिक शक्ति- कौशल की जरूरत है।
उधर देश- काल के अनुसार जगह- जगह से लोकहितकारी आन्दोलन उभर रहे हैं। उन सभी के पीछे कुछ संस्कारवानआत्माओं की भूमिका है। उन्हें भी यह बोध कराना जरूरी है कि वे कोई सामान्य सामाजिक आन्दोलन भर नहीं चला रहे हैं। वे ईश्वरी योजना के अन्तर्गत विशेष दायित्व सँभाल रहे हैं। इसके लिए उनके आन्दोलन के अनुरूप विचार क्रान्ति और नैतिक क्रान्ति के चरण उन्हें समझाये जाने से उनके कार्र्यक्रमों में दृढ़ता और स्थायित्व का विकास होगा।
यह दोनों ही मोर्चे सँभालने के लिए प्रत्यक्ष युग निर्माण आन्दोलन से जुड़े प्राणवान सैनिकों को तैयार होना चाहिए। इसके लिए उन्हें विशेष रूप से ‘शक्ति संवर्धन’ के लिए प्रेरित किया जा रहा है। अगले चरण कठोर चुनौतियों से भरे हैं, उन्हें स्वीकार करने और पार करने के लिए उच्च स्तरीय तैयारी करनी होगी।

मोर्चे के अनुरूप तैयारी
हमारे अभियान का लक्ष्य है ‘युग परिवर्तन’। हम अपनी लौकिक शक्ति को आँकें तो वह कार्य हमारे लिए कठिन ही नहीं, असंभव भी लगता है। उसी तरह जिस प्रकार रीछ- बन्दरों द्वारा समुद्र पर बाँध बनाना और रावण रक्षित लंका को तहस- नहस कर देना। अथवा ग्वाल बालों द्वारा कंस के मायावी राक्षसों से लोहा लेना और गोवर्धन उठाना। किन्तु दिव्य चेतना के सहचर के रूप में ऐसे दुरूह कार्य भी सहज ही सधने लगते हैं। निश्चित रूप से हम उन भाग्यशालियों में से हैं, जिन्हें यह बोध हो गया है कि इस महान प्रयोजन की पूर्ति हेतु हम ‘युग चेतना, युगावतार’ के लीला सहचर हैं। युग चेतना वह परिवर्तन लाने ही वाली है, हमें उसके निष्ठावान सहचर की भूमिका निभानी ही है। क्या किया जाना है यह, समझें। प्रज्ञोपनिषद में लिखा है :-
वह दिन दूर नहीं जब समय बदला हुआ होगा। मनुष्यों के चिन्तर- चरित्र में भारी हेरफेर उत्पन्न होगा। वे निकृष्टता से विमुख होकर उत्कृष्टता के ढाँचे में ढलेंगे। संकीर्ण स्वार्थपरता मिटेगी तो सत्प्रवृत्तियाँ अनायास बढ़ती चली जाएँगी। उदार सहयोग बढ़ने से सर्वत्र हर्ष- उल्लास छा ही जाता है। अगले दिनों न कहीं अपराध दृष्टिगोचर होंगे, न विग्रह। सीमित साधनों में प्रसन्नता होगी तथा उन्हीं में असीम सुख- शान्ति उपलब्ध करने के स्वर्गीय दृश्य सर्वत्र दृष्टिगोचर होने लगेंगे।
विषमता मिटेगी और एकता उत्पन्न होगी। समस्त मनुष्य एक राष्ट्र बनाकर रहेंगे, एक भाषा बोलेंगे। विश्वधर्म और मानवी संस्कृति को सभी प्रेमपूर्वक स्वीकार करेंगे। मनुष्य देवता जैसे दीखने लगेंगे और धरती के कोने- कोने में सुख- शांति का स्वर्गीय वातावरण बन जाएगा। प्रज्ञायुग को भूतकाल के सतयुग से भी अधिक श्रेष्ठ समझा जायेगा और इसे ही वरिष्ठता का श्रेय प्राप्त होगा। (प्रज्ञा पुराण 1/7/47- 55)
इतने महान कार्य में हमें युगऋषि के सहचर की भूमिका निभानी है। जिन कार्यों को महाकाल की चेतना विश्व स्तर पर चलायेगी, उन कार्यों को हमें अपने अभ्यास में लाने और अपने सीमित क्षेत्र के व्यक्तियों को उस धारा में प्रवृत्त करते रहने की क्षमता तो अर्जित करनी ही होगी।
ध्यान रहे, अपनी वर्तमान शक्ति को देखते हुए कार्य करने के संकल्प करने से काम नहीं चलेगा। कार्य की विशालता और महत्ता देखते हुए उसके अगले चरणों की पूर्ति के लिए स्वयं को तैयार करने के संकल्प करने होंगे। हम जिसके सहचर हैं, उससे ‘करिष्ये वचनं तव’ अर्थात् हम आपके कहे अनुसार नैष्ठिक प्रयास निश्चित रूप से करेंगे; कहने पर दिव्य
शक्ति का प्रवाह साधक के साथ जुड़ जाता है। युद्ध छोड़कर सन्यास लेने की बात सोचने वाला अर्जुन, महाभारत विजय के पुरुषार्थ में लग पड़ता है और युगशक्ति के सहयोग से वह श्रेय- सौभाग्य प्राप्त कर लेता है। प्रज्ञा पुराण में स्पष्ट रूप से लिखा भी है :-
जहाँ अर्जुन जैसे कर्मवीर और भगवान जैसे सूत्र संचालक हों, वहाँ असफलता का कोई कारण नहीं। इस प्रसंग में सबसे अधिक लाभ उन्हें मिलना है जो भगवान के सहचर बनकर उनकी मंगलमय युग परिवर्तन प्रक्रिया क्रियान्वित करने में भावनापूर्वक निरंतर जुटे हुए हैं। (प्रज्ञा पुराण 1/7/44- 46)
अस्तु कार्य की जटिलता से डरें नहीं, उसकी महत्ता समझते हुए नैष्ठिक सहचर की उच्च स्तरीय भूमिका निभाने के लिए ‘शक्ति संवर्धन साधना’ पूरी तत्परता से प्रारंभ करें। शक्ति संवर्धन के साथ ही उसके संरक्षण और सुनियोजन की भी जरूरत पड़ती है। शक्तिहीन व्यक्ति बड़ी जिम्मेदारी नहीं सँभाल सकता यह स्पष्ट है। इसके लिए शक्ति संवर्धन जरूरी है। किन्तु संवर्धित शक्ति को निरर्थक प्रयोजनों में नष्ट न होने देकर उसे अभीष्ट प्रयोजन में संकल्पपूर्वक लगा देने की सूझबूझ और नैतिक साहसिकता भी विकसित करनी पड़ती है। हमें यह सभी चरण पूरे करते हुए नवसृजन के अगले बड़े मोर्चे फतह करने हैं।

शक्ति संवर्धन के मूल सूत्र
शक्तिसंवर्धन साधना के मूल सूत्र तीन हैं :-
(क) आस्था दृढ़ करें कि हम युगान्तरकारी चेतना के सहचर हैं। हमें उनके श्रेष्ठतर माध्यम बनना है। यह आस्था जितने अधिक व्यक्तियों में जगाई जा सकेगी, उतनी ही हमारी शक्ति बढ़ेगी।
इस संदर्भ में युगऋषि ने प्रज्ञा पुराण में लिखा है :-
हे तात! सर्वप्रथम दिग्भ्रान्तों को यथार्थता का आलोक दिखाना और सन्मार्ग अपनाने के लिए तर्क और तथ्यों सहित मार्गदर्शन करना है। दूसरा उपाय इस आधार पर उभरे हुए उत्साह को किसी सरल कार्य में जुटा देना है ताकि वे युगधर्म से प्रेरित और उसके अभ्यस्त हो सकें। इन दो चरणों के उठ जाने पर आगे की प्रगति का आधार मेरी अवतरण प्रक्रिया, युगान्तरीय चेतना स्वयमेव सम्पन्न कर लेगी। (प्रज्ञा पुराण 1/1/48- 51)
(ख) जीवन साधना द्वारा अपने और अपने प्रभावक्षेत्र के व्यक्तियों के व्यक्तित्व को पहले से अधिक पवित्र और प्रखर बनाना है। परिष्कृत व्यक्तित्व ही उच्च स्तरीय जिम्मेदारियाँ सँभाल सकेंगे। इनकी संख्या और गुणवत्ता बढ़ाने से निश्चित रूप से शक्ति संवर्धन होगा।
युगसृजन में सहयोग करने के लिए सभी भावनाशीलों को समयदान और अंशदान की उमंग उभारनी चाहिए। वरिष्ठों की इस संयुक्त शक्ति से ही दुर्गावतरण जैसी प्रचण्डता उत्पन्न होगी और युग समस्याओं के निराकरण में समर्थ होगी। (प्रज्ञा पुराण 1/1/65- 68)
समयदान एवं अंशदान की शुरुआत कर देना या करा देना काफी नहीं है, हर साधक को उस क्रम में अपना स्तर बढ़ाते रहना भी जरूरी है। युगऋषि ने लिखा है :-
अपने लोभ- मोह और काम- क्रोध पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। भगवान ने जो शरीरबल, बुद्धिबल, साधनाबल दिया है उसे सच्चे मन से
विश्वमानव के, नर- नारायण के चरणों पर अर्पित करने के लिए उल्लास और उत्साह उत्पन्न करना चाहिए। वह आत्म समर्पण व्यक्ति का भी कल्याण करेगा ओर समाज के लिए भी सुख- सौभाग्य के दिन वापस लाएगा। युग निर्माण परिवार के परिजनों का आत्मिक विकास क्रम इसी दिशा में गतिशील रहना चाहिए। वे सक्रिय सदस्य से कर्मठ कार्यकर्त्ता बनें और अन्तत: कर्मयोगी वानप्रस्थ के रूप में जीवन यज्ञ की पूर्णाहुति करते हुए पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करें। (हमारी युग निर्माण योजना भाग- 1, पृष्ठ 160)
(ग) संघबद्धता :: इस प्रकार आस्था और जीवन साधना के आधार पर उभरे हुए व्यक्तियों को संगठित करके उनके समयदान और अंशदान के क्रम को नियमित और अधिक प्रभावपूर्ण बनाते रहने के संघबद्ध प्रयास किए जायें। ऐसी संगठित इकाइयाँ ही समाज में दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन की दिव्य योजनाओं को मूर्त रूप दे सकती हैं।
इस संदर्भ में ‘हमारी युग निर्माण योजना’ में युगऋषि ने लिखा है :-
अपने उपार्जित इन सभी पुष्पों को एक माला में पिरोकर उसे नर- नारायण के चरणों में श्रेष्ठतम श्रद्धांजलि की तरह अर्पण करना चाहिए। संगठित सज्जनों को ही देव समाज कहते हैं। इन लोगों को संगठित करने का कार्य भी हमें अपने पवित्र कर्त्तव्य में सम्मिलित रखना चाहिए। (पृष्ठ 162)
संगठित व्यक्तियों के प्रशिक्षण और सुनियोजन के लिए प्रज्ञा केन्द्रों, प्रज्ञापीठों, शक्तिपीठों को समर्थ बनाने का निर्देश युगऋषि ने दिया है।
हे नारद! युग देवालय प्रज्ञापीठों के रूप में बनें। वहाँ से सृजनात्मक और सुधारात्मक सभी प्रवृत्तियों का सूत्र संचालन हो जिससे मनुष्य का स्वरूप एवं भविष्य सुधरे; साथ ही महान परिवर्तन के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि भी बनने लगे। (प्रज्ञा पुराण 1/1/72- 74)
युगऋषि ने नवसृजन के लिए निर्धारित लक्ष्यों का स्वरूप, उनके लिए शक्ति संवर्धन की आवश्यकता और उसके प्रामाणिक सूत्र बहुत स्पष्टता से समझाये हैं। उन्हें अपनाने और निश्चित अवधि में वाञ्छित परिणाम निकालने की साधना हमें करनी है।
समयबद्ध लक्ष्य बनायें
नवसृजन का अभियान तेज हो रहा है। वन्दनीया माताजी की जन्म शताब्दी (सन् 2026) तक विश्वव्यापी स्तर तक नवयुग अवतरण की झलक- झाँकी स्पष्ट दिखाई देने लगे, इस संकल्प के साथ नौ वर्षीय मातृशक्ति श्रद्धांजलि नवसृजन महापुरश्चरण प्रारंभ किया जा चुका है। उसे सही स्तर तक सफल बनाने के लिए हम सबको शक्ति संवर्धन साधना करनी ही है। इस आलेख में पूज्य गुरुदेव द्वारा निर्दिष्ट कार्यों को पहले से बेहतर स्थिति में पहुँचाने की अविचल निष्ठा विकसित करनी होगी।
सभी परिजन और सभी संगठित इकाइयाँ इस संदर्भ में गहन आत्म समीक्षा करें। हर वर्ष अपना एक- एक चरण बढ़ाते हुए नौ वर्षों में कम से कम अपने क्षेत्र में युगऋषि के निर्देशों को साकार करने की ठान लें। अगले अंक में सामूहिक समीक्षा के साथ बढ़ाये जा सकने वाले आवश्यक और व्यावहारिक सूत्रों पर प्रकाश डाला जाएगा।


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