Published on 2018-04-20

डॉ पण्ड्याजी ने विद्यार्थियों को बताया मानव जीवन की गरिमा का धर्म

हरिद्वार २० अप्रैल।

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि मानव जीवन यज्ञमय होना चाहिए। यज्ञ अर्थात् दान, भावनाओं का दान, कर्म का दान आदि। जो कुछ समाज, पर्यावरण, समष्टि के निमित्त करते हैं, उसका भाव हमेशा दान की तरह होना चाहिए।

वे देसंविवि के मृत्युंजय सभागार में गीतामृत पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। कुलाधिपति जी ने कहा कि यज्ञमय जीवन का अर्थ, समर्पण तथा दान से है। मानव जीवन एक ऐसा जीवन है, जिसमें एक- दूसरे के सहयोग के बिना प्रसन्नता से रहना कठिन है। उन्होंने कहा कि भावनाओं, कर्म और समय का दान हम जितनी प्रबल भावनाओं से करते हैं, उतनी प्रबल शक्ति से हमें उसका पुण्य एवं लाभ मिलता है। जब अपनी प्रिय वस्तुओं का उपयोग विश्व कल्याण के लिए निःस्वार्थ भाव से करते हैं, तो उससे संतुष्ट हुए जीव, वनस्पतियाँ आदि भी मनुष्य के लिए अनुकूल परिस्थियाँ जुटाते हैं। जिससे वह आरोग्य, सुख- साधन, फल- फूल, धन- धान्य आदि विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ को प्राप्त करता है और आनंदित होता है।
कुलाधिपति डॉ. पण्ड्याजी ने कहा कि मन में सबके लिए सद्भावनाएँ रखना, संयमपूर्ण रहना, दूसरों की भलाई के लिए प्रयत्नशील रहना, सत्प्रयोजनों के लिए अपनी प्रतिभा का उपयोग करना, भगवान का स्मरण करते रहना, अपने कर्तव्य पथ पर आरूढ़ रहना, अनुकूल- प्रतिकूल परिस्थितियों में विचलित न होना आदि नियमों का पालन करने से जीवन यज्ञमय बन जाता है।

श्रद्धेय डा. पण्ड्याजी ने कहा कि मनुष्य जीवन को सफल बना लेना ही सच्ची दूरदर्शिता और बुद्धिमता है और इस दिशा में कदम बढ़ाने का सबसे सुन्दर अवसर किशोरावस्था ही है, जहाँ भविष्य की आधारशिला रखी जाती है। उन्होंने कहा कि अच्छा जीवन जीने के लिए उसके नियमों को समझना आवश्यक है, जो उन्हें समझ लेता है, वही मानव जीवन का आनंद उठा पाता है। मनुष्य जीवन में जितनी भी कमियाँ होती हैं, वे सब उसके कर्मों और भावनाओं की वजह से होती हैं। अगर हम शुभ और पुण्य कार्य करते हैं, तो हम प्रेम के भागीदार बनते हैं, अन्यथा घृणा के, इसलिए हमें निरंतर अपने जीवन में अच्छे कर्म करने चाहिए। इस अवसर पर विवि के कुलपति श्री शरद पारधी, प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी सहित विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर्स एवं विद्यार्थीगण उपस्थित रहे।


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