Published on 2018-04-22

जयपुर। अखिल विश्व गायत्री परिवार और चेतना ग्राम संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को आओ गढ़े संस्कारवान पीढ़ी कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसमें सभी वक्ताओं ने वैदिक कालीन संस्कारों की परंपम्परा को पुनः जाग्रत करने पर बल दिया। जबलपुर से आई वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ अमिता सक्सेना ने कहा कि पुंसवन संस्कार एक तरह का आध्यत्मिक टीकाकरण है जो आत्मा के मलिन संस्कारों से मुक्ति दिलाता है। प्राचीनकाल में हमारे ऋषि संस्कारों के माध्यम से भावी पीढ़ी को युग के अनुकूल बनाते थे। आज यह परम्परा फिर से तेज करनी होगी। इसमें डॉक्टर की बड़ी जिम्मेदारी है। वे सोनोग्राफी के साथ पुंसवन संस्कार भी करवाए। डॉ सरोज गुप्ता ने कहा कि माँ के आहार विहार, चिंतन, जीवन शैली का गर्भस्थ शिशु पर पूरा असर होता है। माँ बच्चे की पहली गुरु है। उन्होंने गर्भावस्था के दौरान लेनी वाली औषधि की भी जानकारी दी। गायत्री शक्तिपीठ ब्रह्मपुरी के ताराचंद पंवार ने गायत्री परिवार के संस्थापक पंडित श्रीराम शर्मा के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। विभा अग्रवाल ने कहा कि पुसंवन संस्कार से स्वस्थ, सुंदर और गुणवान संतान पूरी तरह संभव है। पुसंवन संस्कार गर्भवती महिला को आत्मिक रूप से सबल बनाता है। सामवेद में इस संस्कार का उल्लेख मिलता है। जब गर्भ जब दो-तीन महीने का होता है तब गर्भस्थ शिशु के पूरे विकास के लिए पुंसवन संस्कार किया जाता है। स्त्री के गर्भ में तीसरे महीने से शिशु का शरीर बनना शुरू हो जाता है जिसके कारण शिशु के अंग और संस्कार दोनों अपना स्वरूप बनाने लगते हैं। गर्भस्थ बच्चे पर माता-पिता के मन और स्वभाव का गहरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए माता को मानसिक रूप से गर्भस्थ शिशु की ठीक तरह से देखभाल करने योग्य बनाने के लिए यह संस्कार कराया जाता है। इससे पूर्व गायत्री मंत्र का जप हुआ। इस अवसर पर चिकित्सा मंत्री कालीचरण सराफ, महिला आयोग की चेयर पर्सन सुमन शर्मा, गायत्री परिवार के जोन प्रभारी अम्बिका प्रसाद श्रीवास्तव, सोमकान्त शर्मा, ज्योति खंडेलवाल, वीरेंद्र अग्रवाल, आलोक अग्रवाल, राजू मंगोडीवाला मौजूद थे।


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