Published on 2018-04-23

पुंसवन संस्कार पर कार्यशाला का आयोजन
जयपुर। गर्भवती महिला के पेट में पल रहा शिशु न केवल स्वस्थ हो बल्कि अच्छे संस्कार लेकर भी पैदा हो, इसके लिए सोमवार को सीतापुरा औद्योगिक क्षेत्र स्थित स्वास्थ्य कल्याण इंस्टीट्यूट ऑफ नेचुरोपैथी एंड यौगिक साइसेंज में पुंसवन संस्कार पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसमें होम्योपैथी और फीजियोथैरेपी के चिकित्सकों, नर्सिंग के विद्यार्थियों ने भाग लिया। कार्यशाला का आयोजन गायत्री परिवार और चेतना ग्राम संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।
जबलपुर से आई वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अमिता सक्सेना ने कहा कि आज चिकित्सक गर्भवती महिला के शरीर में विटामिन, कैल्सियम, मिनरल सहित विभिन्न उपयोगी तत्वों की कमी पर उनकी पूर्ति के लिए दवा देते हैं, इंजेक्शन लगाते हैं लेकिन उनके पेट में पल रहे शिशु के संस्कारों के लिए कुछ नहीं कर रहे। जबकि शिशु अपने पूर्वजन्म के कुछ गलत संस्कारों को लेकर आता है। माता-पिता के संस्कारों का भी उस पर प्रभाव होता है। दुर्भाग्य है कि मेडिकल की पढ़ाई के दौरान ऐसा कुछ भी नहीं सिखाया जाता। आज पाश्चात्य जगत की किताबे पढ़ कर डॉक्टर बन रहे हैं। जबकि भारत के ऋषि-मुनियों ने सोलह संस्कारों में दूसरे नंबर के पुंसवन संस्कार इसी के लिए कराया जाता था। यह एक तरह का आध्यत्मिक टीकाकरण है जो आत्मा के मलिन संस्कारों से मुक्ति दिलाता है। प्राचीनकाल में हमारे ऋषि संस्कारों के माध्यम से भावी पीढ़ी को युग के अनुकूल बनाते थे। आज यह परम्परा फिर से तेज करनी होगी। उन्होंने कहा कि पहले माता-पिता अपनी इच्छा के अनुसार संतान पैदा करते थे। इसके लिए गर्भाधान संस्कार होता था। दूसरे नंबर का संस्कार पुंसवन है। यह नींव का पत्थर है। इसमें डॉक्टर की बड़ी जिम्मेदारी है कि वे इसके लिए लोगों को प्रेरित करें। यह किसी धर्म से जुड़ा धार्मिक कर्मकांड नहीं हैं वरन विज्ञान की एक क्रिया है। चिकित्सक सोनोग्राफी के साथ पुंसवन संस्कार भी करवाएं। इस संस्कार के माध्यम से शिशु को गर्भ में ही शिक्षा दी जाती है। उल्लेखनीय है कि डॉ. अमिता सक्सेना जबलपुर के प्रसिद्ध निजी हॉस्पीटल में कार्यरत हैं। वे हर गर्भवती महिला का पुंसवन संस्कार करवाती है।
आहार-विहार पर दें पूरा ध्यान:
अलवर से आईं वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉं. सरोज रावत ने कहा कि मां के आहार-विहार, चिंतन, जीवन शैली पर गर्भस्थ शिशु पूरी नजर रखता है। वह दो नहीं सौ आंखों से देखता है और सौ कानों से सुनता है। इस अवसर पर वीडियो प्रोजेक्टर के माध्यम से समझाया कि गर्भवती महिला के तनाव में रहने से किस प्रकार गर्भस्थ शिशु के माथे पर सिकन आ जाती है तथा उनके नृत्य करने पर वह भी ताली बजाकर नाचता है। वीर अभिमन्यु, शिवाजी ने गर्भ में मिली शिक्षा ग्रहण की और दुनिया में आकर बहुत नाम कमाया।
माता-पिता रखें आदर्श जीवन शैली:
कार्यक्रम संयोजक विभा अग्रवाल ने कहा कि पुसंवन संस्कार से स्वस्थ, सुंदर और गुणवान संतान पूरी तरह संभव है। पुसंवन संस्कार गर्भवती महिला को आत्मिक रूप से सबल बनाता है। जब गर्भ दो-तीन महीने का होता है तब गर्भस्थ शिशु के पूरे विकास के लिए पुंसवन संस्कार किया जाता है। स्त्री के गर्भ में तीसरे महीने से शिशु का शरीर बनना शुरू हो जाता है जिसके कारण शिशु के अंग और संस्कार दोनों अपना स्वरूप बनाने लगते हैं। गर्भस्थ बच्चे पर माता-पिता के मन और स्वभाव का गहरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए माता को मानसिक रूप से गर्भस्थ शिशु की ठीक तरह से देखभाल करने योग्य बनाने के लिए यह संस्कार कराया जाता है। प्रारंभ में प्रिंसीपल सतीश कुमार अवस्थी ने अतिथियों का स्वागत किया।


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