किसुमु और मोम्बासा में हुए दीपयज्ञ

Published on 2018-04-22

अवतारी चेतना के प्रति श्रद्धा- समर्पण और जीवन साधना की उमंगें प्रगाढ़ हुर्इं

डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी ४ एवं ५ अप्रैल को केन्या में थे। वे किसुमु और मोम्बासा में आयोजित दीपयज्ञ के विशाल कार्यक्रमों में उपस्थित रहे। उनकी प्रेरणा और प्रोत्साहन से जहाँ युवा रक्त में लोकमंगल की भावनाएँ प्रगाढ़ हुर्इं, वहीं मिशन की नींव रखने वाले समर्पित कार्यकर्त्ताओं में भी सक्रियता का नव उल्लास जागा।

दोनों ही स्थानों पर मानव जीवन की गरिमा पर मार्मिक उद्बोधन हुए। शांतिकुंज प्रतिनिधि ने कहा कि सारे धर्म, सारे महापुरुष एक स्वर से मानव जीवन को परमात्मा की सर्वोत्तम कृति बताते हैं। इसी दृढ़ मान्यता के साथ हमें अपनी सामर्थ्य का निरंतर विकास करते रहना चाहिए और परमात्मा की इच्छा के अनुरूप लोकमंगल के कार्यों में उसका सदुपयोग करना चाहिए। जीवन की सार्थकता और सुख- शांति का यही राजमार्ग है। गुरुदेव की इस प्रेरणा को संसार के हर व्यक्ति तक पहुँचाकर ही विश्व शांति का स्वप्न साकार हो सकेगा।

इन दीपयज्ञों में डॉ. चिन्मय जी ने गायत्री की उपासना साधना से अंत:करण को पवित्र और आत्मबल सम्पन्न बनाने की साधना निरंतर करते रहने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि पवित्र अंत:करण में ही परमात्मा की शक्तियों का अवतरण होता है।

शांतिकुंज प्रतिनिधि शांतिलाल पटेल, ओंकार पाटीदार एवं बसंत यादव की टोली ने क्रांतिकारी प्रज्ञागीतों से जनभावनाओं को प्रेरक उछाल दी व दीपयज्ञों का भावभरा संचालन भी किया।

मैं यहाँ के कण- कण को प्रणाम करता हूँ। परम पूज्य गुरुदेव चाहते थे कि उनसे जुड़ा प्रत्येक कार्यकर्त्ता एक चलता- फिरता मंदिर बने।


सनातन मंदिर, किसुमु मेंमोम्बासा में परम पूज्य गुरुदेव द्वारा प्राण प्रतिष्ठित गायत्री मंदिर के दर्शन,


४ अप्रैल को सनातन हिंदू संगठन द्वारा स्थानीय हिन्दू मंदिर में दीपयज्ञ का आयोजन किया गया। जिसमें मंदिर के अध्यक्ष श्री हितेश देरोदरा, ट्रस्टी डॉ. प्रजापति, जयंती पटेल, विनोद पटेल, गोविंद पटेल, पुरुषोत्तम कोटेचा, शांतिकुंज के परिजन हलधर ठाकरे, हिन्दू काउंसिल के ट्रस्टी रमेश मेहता सहित लगभग ६०० श्रद्धालुओं ने इस कार्यक्रम का लाभ लिया।

परम पूज्य गुरुदेव १९७२ में मोम्बासा पहुँचे थे। वहाँ उन्होंने स्वयं गायत्री मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की और अनेक कार्यकर्त्ताओं को दीक्षा भी दी थी।

डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी ५ अप्रैल को नैरोबी से रेलमार्ग से मोम्बासा पहुँचे। सर्वप्रथम गायत्री मंदिर पहुँचकर बड़ी श्रद्धा के साथ पू. गुरुदेव द्वारा प्रतिष्ठित गायत्री माता के दर्शन किए, आरती उतारी। वहाँ गायत्री साधकों का अनुभव सुनते हुए वे भावविभोर हो गए। सर्वश्री हरीश गौर, भरत भट्ट, डॉ. पंचोली सहित लगभग सैकड़ों कार्यकर्त्ता- श्रद्धालुओं ने वहाँ आयोजित दीपयज्ञ में भाग लिया। डॉ. चिन्मय जी ने अपनी बात आरम्भ करने से पूर्व कहा, "मैं यहाँ के कण- कण को प्रणाम करता हूँ। "परम पूज्य गुरुदेव चाहते थे कि उनसे जुड़ा हर कार्यकर्त्ता एक चलता- फिरता शक्तिपीठ बने, अपने आदर्शनिष्ठ जीवन से जन- जन में सच्ची आस्था जगाए। यह प.पू. गुरुदेव के जीवन आदर्श, उनके विचारों को अपनाने की साधना से ही संभव है।


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