Published on 2018-04-28

जयपुर। विज्ञान और अध्यात्म अलग-अलग नहीं वरन् एक ही सिक्के के दो पहलू है। इनमें विभेद है भेद नहीं। आने वाले समय में ये दोनों हाथ मिलाएंगे। ये विचार अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख तथा देव संस्कृति विश्व विद्यालय के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पंड्या ने शनिवार को सीतापुरा के महात्मा गांधी हॉस्पिटल स्थित आर एल स्वर्णकार सभागार में वैज्ञानिक अध्यात्मवाद-आने वाले भविष्य का धर्म विषयक व्याख्यान में व्यक्त किए। ं हॉस्पीटल के निदेशक डॉ. एम एल स्वर्णकार, इंडिया एजुकेशन ट्रस्ट की उपाध्यक्ष मीना स्वर्णकार, डॉ. हरि गौत्तम, डॉ. एम सी मिश्रा, डॉ. सुधीर सचदेवा ने डॉ. पंड्या का अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि आज विज्ञान ने दुनिया बदलकर रख दी है। कभी आवागमन के साधन तक नहीं थे और आज हवा की गति से कई गुना तेज गति के विमानों का जमाना है। विज्ञान अच्छा या बुरा नहीं है। विज्ञान के साथ अध्यात्म की जुगलबंदी हो जाए तो देश और दुनिया को कई गुना लाभ मिलेगा। विज्ञान जहां जड़ पदार्थों से जुड़ा हैं वहीं अध्यात्म चेतन जगत से संबंध रखता है । आध्यात्मिक भाषा में इसे प्रकृति और पुरुष की संज्ञा दी गई है। प्रकृति में पांच तत्व है लेकिन उनमें चेतना नहीं है। विज्ञान की परिभाषा है कि वह चीज जिसे इंद्रियों के माध्यम से दिखाया जा सके चाहे इसके लिए यंत्रों का उपयोग करना पड़े। जबकि अध्यात्म चेतना का उच्च स्तरीय विज्ञान का नाम है। आज धारणा बनती जा रही है कि जो वैज्ञानिक है वह अध्यात्मवादी नहीं हो सकता और जो अध्यात्मवादी है वह वैज्ञानिक हो सकता। यह धारण गलत है। हमने प्रकृति का शोषण करके विज्ञान की बहुत सेवा की है। हमारा भला चाहने वाली परम चेतना से जोडऩे वाली चीज का नाम अध्यात्म है। धर्म के नाम पर कुप्रथाएं चल पड़ी है। पर्दा प्रथा भी एक कुप्रथा है। राजस्थान में पर्दा प्रथा की क्या आवश्यकता है। यह स्त्रियों के लिए परेशानी का कारण बन रही है। विज्ञान विनाशकारी प्रयोग कर प्रकृति के विपरीत कार्य कर रहा है। आज हमें मिसाइल से विध्वंस करने वाले विज्ञान की आवश्यकता नहीं है।
विज्ञान-अध्यात्म का समन्वय जरुरी:
उन्होंने कहा कि आज विज्ञान ने पदार्थ को ही सब कुछ मान लिया है। विज्ञान पदार्थ की मूल इकाई की खोज कर रहा। वैज्ञानिक गॉड पार्टिकल की खोज कर रहे हैं जबकि पहले वैज्ञानिकों ने भगवान के अस्तित्व को ही नकार दिया था। वेदांत ने अध्यात्म को बहुत कुछ दिया है विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय होना बहुत जरुरी है। पदार्थ का रूपांतरण ऊर्जा में और प्राप्त ऊर्जा का प्रकटीकरण चेतन में होगा तभी दोनों में समन्वय होगा। हमारे ऋषि-मुनियों के पास यंत्र नहीं थे, प्रयोगशालाएं नहीं थीं । उन्होंने शरीर को ही प्रयोगशाला बना लिया और साबित किया कि हमारे अंदर अपार वैभव भरा पड़ा है। उस शक्ति को जागृत करना होगा। ऋषियों ने यह सिद्ध करके दिखाया भी है।
पाप करे और गंगा नहाएं से काम नहीं चलेगा:
उन्होंने कहा कि आज विज्ञान धर्म को बेकार की चीज मानना है। क्योंकि जिन के कंधों पर धर्म का सही स्वरुप जनता के समक्ष लाने की जिम्मेदारी थे उन्होंने मूढ़ मान्यताएं फैला दी। मान्यता हो गई है कि सोमवती अमावस्या का स्नान करने से सारे पाप धुल जाएंगे। आज तक किसी ने इस मान्यता का खंडन नहीं किया। क्योंकि इससे बाबाओं के स्वार्थ जुड़े हैं।
खेती में जुट जाएं बाबा तो बदल जाए खेतों की सूरत:
प्रणव पंडया ने कई बाबाओं के जेल में होने के प्रसंग हो छूते हुए कहा कि बाबाओं ने धर्म का अर्थ ही बदल दिया है। आज देश में लाखों बाबा हैं। ज्यादातर निष्क्रिय बैठे हैं यदि वे खेती के कार्य में जुट जाएं तो खेतों की तस्वीर बदल सकते हैं। अध्यात्म का सूर्य ही इस मूढ़ मान्यताओं का कुहासे को दूर करेगा। विज्ञान और अध्यात्म में विभेद है भेद नहीं।
बताएं जीवन में सफलता के सूत्र:
*अपना सुधार स्वयं करे कोई बाहरी शक्ति आपका नहीं सुधार सकती
* मन ही आपका शत्रु है औ मन ही मित्र।
* नकारात्मक विचारों की जगह सकारात्मक विचारों को स्थान दे।
*जीवन में अनुशासन बनाएं रखें।
* जीवन कैसा है यह देखने के लिए हॉस्पीटल में बीमार व्यक्तियों से मिलें।
* जीवन को सत्य रुप में ही जीएं।
*प्रतिदिन ध्यान करें, समाजसेवा में समय लगाएं।


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