जयपुर, राजस्थान में श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी की दो विशिष्ट सभाएँ

Published on 2018-05-06

जो परिस्थितियों से तालमेल बिठाकर निरंतर बढ़ता रहे, वही अध्यात्मवादी है

न्यायमूर्ति माननीय श्री एस.एस. कोठारी, लोकायुक्त, राजस्थान के आवास पर आयोजित हुई विशिष्ट महानुभावों की गोष्ठी

संदेश सार :
तनाव से बचने के लिए आवश्यक है
  • आध्यात्मिक जीवन शैली अपनाना
  • अपनी शक्तियों को पहचानना
  • मन को साधना, उसे अपना मित्र बनाना
  • आत्मबल बढ़ाने का अभ्यास
  • परमात्म चेतना में स्नान का नियमित ध्यान

मनुष्य का परिस्थितियों पर तो वश नहीं, लेकिन वह परिस्थितियों से तालमेल बिठाना तो सीख सकता है। जो परिस्थितियों से तालमेल बिठाना जानता है, सही मायनों में वही सच्चा अध्यात्मवादी है। वही जीवन का सच्चा आनन्द लेना जानता है। वही बाधाओं को चीरकर जीवन में आगे बढ़ता जाता है। जब परिस्थितियों के सामने मन:स्थिति गड़बड़ाने लगती है, तभी व्यक्ति तनावग्रस्त होने लगता है। यह तनाव ही आज बीमारियों का सबसे बड़ा कारण है।

अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने न्यायमूर्ति माननीय श्री एस.एस. कोठारी, लोकायुक्त, राजस्थान द्वारा अपने आवास पर आयोजित विशिष्ट महानुभावों की संगोष्ठी को संबोधित करते हुए यह बात कही। वे लगभग १५० सुप्रसिद्ध न्यायविदों, वरिष्ठ अधिकारियों, प्रतिष्ठित व्यापारियों एवं समाज के गणमान्य विद्वानों के समक्ष च्तनाव परावर्तन के लिए ध्यान एवं जीवन प्रबंधनज् विषय पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे।

यह संगोष्ठी २७ अप्रैल को सायंकाल हुई। आरंभ में नगर के गणमान्यों ने माल्यार्पण कर शांतिकुंज प्रतिनिधि का स्वागत किया। माननीय लोकायुक्त महोदय ने श्रद्धेय के स्वागत में भावविभोर कर देने वाले हृदयोद्गार व्यक्त किये। युग संदेश से पूर्व शांतिकुंज के युगगायकों ने 'जिसने जीते हृदय वही होता विश्व विजेता....' गीत के साथ विषय के अनुरूप श्रोताओं की मनोभूमि तैयार की।

श्रद्धेय डॉ. साहब ने माननीय श्री एस.एस. कोठारी जी के प्रति आभार अभिव्यक्ति के साथ अपनी बात आरंभ की, जिन्होंने नगर के गणमान्यों तक युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का संदेश पहुँचाने का अवसर प्रदान किया।

श्रद्धेय ने अपने संदेश में बताया कि तनाव दो प्रकार के होते हैं, रचनात्मक तनाव और विनाशकारी तनाव। अध्यात्म से आत्मबल की वृद्धि होती है, जिससे व्यक्ति को सकारात्मक सोच के साथ परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करने की, उनके साथ तालमेल बिठाने की शक्ति मिलती है। भौतिकवादी सोच वाले कमजोर आत्मबल के व्यक्ति ही परिस्थितियों के गुलाम होकर तरह- तरह की हताशा, निराशा, बेचैनी, अवसाद, भय के शिकार होते और पतन- पराभव के गर्त में जाते देखे जाते हैं।

उन्होंने कहा कि तनाव जीवन का अनिवार्य अंग है। उसका प्रत्यावर्तन करना सीखो। आध्यात्मिक जीवन शैली अपनाते हुए आत्मबल विकसित करो। अपना मूल्यांकन करना सीखो। आत्मचिंतन, आत्मशोधन, आत्मनिर्माण और आत्मविकास के चरणों को अपनाओ। अपने लिए ही नहीं, समाज के लिए जीने का अभ्यास करो। ध्यान परमात्म चेतना में स्नान करने का सर्वोत्तम उपाय है।

संगोष्ठी का समापन उगते सूर्य के ध्यान के संक्षिप्त अभ्यास के साथ हुआ।

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