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दि. 16 जून 2013 की सायं. एवं 17 जून 2013 की प्रातः हिमालय क्षेत्र में विशेषकर केदारघाटी में तुफानी वर्षा एवं बादल फटने से भयानक विपदा घटित हुई, जिसमें हजारों यात्री और स्थानीय लोगो की जीवन लीला समाप्त हो गई। अभी भी उस क्षेत्र में भारी बरसात हो रही है। क्षेत्र की संभवतः सभी नदियों ने विकराल रूप धारण कर लिया है।
    इस विपदा में शांतिकुंज, हरिद्वार की प्रेरणा से हजारों गायत्री परिजन राहत योजनाओं में अपना सर्वस्व योगदान दे रहे हैं। 16 जुलाई 2013 मंगलवार को इस त्रासदी को एक माह पूर्ण हो रहा है। इस विपदा में भारत के सभी क्षेत्रों के तीर्थयात्री प्रभावित हुये हैं।
     गायत्री परिवार शांतिकुंज, हरिद्वार द्वारा संपूर्ण भारत तथा विदेशों में स्थित सभी शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों एवं चेतना केन्दों में मंगलवार दिनांक 16 जुलाई 2013 को विपदा में आहत परिजनों के ताप शमन, शान्ति हेतु सायं. 6:30 से 7:00 बजे तक विशेष प्रार्थना सभा का आयोजन होना है।
इस सभा मे आपदा- ग्रस्त जनता के भावात्मक पोषण, पूर्ण स्वस्थता हेतु एवं कालकवलित यात्रियों के आत्मा की शान्ति हेतु प्रार्थना में कार्यक्रम का निम्रलिखित स्वरूप होगा।

1) वरिष्ठ परिजन द्वारा प्रास्तावित  - 5 मिनिट
2) रुद्राष्टक पाठ                  :
3) गायत्री मंत्र पाठ           - 11 बार
4) महामृत्युंजय मंत्र         - 5 बार
5) मौन प्रार्थना               - 5 मिनिट
6) शान्तिपाठ समापन

   इस प्रार्थना सभा में अन्यान्य भाषण नहीं होंगे। केवल प्रारम्भ में सभा का उद्देश्य बताकर पूर्ण गंभीरता से प्रार्थना सभा आयोजित हो, ऐसी अपेक्षा की गयी है।
   यह जानकारी सभी सम्बन्धित शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों, चेतना केन्द्रों एवं समस्त परिजनों तक पहुँचा दें, जिससे पूरे देश में 16 जुलाई 2013 को एक ही समय में हुतात्माओं की शान्ति के लिए भावभरी श्रद्धांजलि अर्पित की जा सके।
                                                                                          - शांतिकुंज, हरिद्वार

                                    
                                       श्रीरुद्राष्टकम्

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजे हं॥1

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।

करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतो हं॥2

तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥3

चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं।

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥4

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।

त्रय: शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजे हं भवानीपतिं भावगम्यं॥5

कलातीत कल्याण कल्पांतकारी। सदासज्जनानन्ददाता पुरारी।

चिदानन्द संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥6

न यावद् उमानाथ पादारविंदं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।

न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥7

न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतो हं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।

जराजन्म दु:खौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्न्मामीश शंभो॥8

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।

ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु: प्रसीदति॥


 

  श्रीरुद्राष्टकम् 
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