Published on 2018-05-28

शिक्षक गरिमा शिविर शृंखला आरंभ, श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने गुजरात के शिविर में दिया संदेश

  • शांतिकुंज में शिक्षक गरिमा शिविर शृंखला ५ मई से आरंभ हुई जो जून माह तक चलेगी।
  • गुजरात शिविर से पूर्व उत्तर प्रदेश के शिक्षकों का शिविर ५ से ७ मई की तारीखों में सम्पन्न हुआ।
  • इन दो माह में शिक्षक गरिमा शिविरों के अलावा छात्र प्रतिभा परिष्कार और शिक्षक- छात्र सम्मान समारोहों का भी आयोजन हो रहा है।

विश्व को शांति और प्रगति के सही मार्ग पर चलना है तो भारत और सारे विश्व को पाश्चात्य सभ्यतावादी सोच को बदलकर भारतीय संस्कृति और अध्यात्म के साँचे में ढालना होगा।

श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने शांतिकुंज में दिनांक १० से १२ मई की तारीखों में चल रहे गुजरात प्रांत के शिक्षक गरिमा शिविर को संबोधित करते हुए यह संदेश दिया। इस अवसर पर देशभर से आये साधक- शिविरार्थी भी सैकड़ों की संख्या में उपस्थित थे। श्रद्धेय डॉ. साहब ने कहा कि अध्यात्म व्यक्ति को आत्मशक्ति सम्पन्न बनाने के साथ उनमें लोकमंगल की भावना जगाता है, आत्मानुशासन में रहने की प्रेरणा देता है।

श्रद्धेय डॉ. साहब ने भारतीय संस्कृति की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह वह साँचा है, जिसमें ढलने वाले संस्कारवान, सद्गुणी, परमार्थपरायण, राष्ट्रभक्त बनते जाते हैं। आज समाज को ऐसे ही देशभक्तों की आवश्यकता है जो अपना आदर्श प्रस्तुत करते हुए समाज को सही राह पर चला सकें।

परम पूज्य गुरुदेव के दिये सूत्र 'अध्यापक हैं युग निर्माता, छात्र राष्ट्र के भाग्य विधाता' की व्याख्या करते हुए उपस्थित गुरुजनों को उनकी गौरव- गरिमा का बोध कराया। उन्होंने कहा कि शिक्षक होना केवल रोजगार का अवसर नहीं है, यह राष्ट्र की सेवा और जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाने का अद्वितीय सौभाग्य है। भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा लेना, पुरस्कार बाँटना नहीं है। इसका मूल प्रयोजन विद्यार्थियों को संस्कारों के साँचे में ढालकर उन्हें सद्गुणी- संस्कारवान बनाना है।

श्रद्धेय डॉ. साहब ने शिक्षकों को भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा की सफलता का सूत्रधार बताया, कहा कि उन्हें पाठ्यक्रम पूरा कराने के साथ बच्चों को भारतीय संस्कृति के साँचे में ढालने के नैतिक दायित्व को हर समय ध्यान में रखना चाहिए। इस संदर्भ में उन्होंने महात्मा गाँधी, युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य आदि महापुरुषों को अपना आदर्श मानने की प्रेरणा भी दी।
अतिथि बनकर आये, परिवार के सदस्य बनकर लौटे
शिक्षक गरिमा शिविरों के प्रतिभागियों को उनकी गौरव- गरिमा का बोध कराने के साथ शांतिकुंज की दिनचर्या में भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्वों के दर्शन कराये जा रहे हैं। देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी, शांतिकुंज के व्यवस्थापक श्री शिव प्रसाद मिश्रा सहित यहाँ के वरिष्ठ प्रतिनिधि उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं। शांतिकुंज, देसंविवि, ब्रह्मवर्चस दर्शन के क्रम में गायत्री परिवार के विश्वव्यापी अभियान का परिचय कराया जा रहा है। प्रश्नोत्तरी और अभिव्यक्ति के क्रम में उन्हें अपनी जिज्ञासाओं के समाधान का भी भरपूर अवसर मिल रहा है।

इन शिक्षक शिविरों में भाग लेने वाले गद्गद हैं। उनकी अभिव्यक्तियों में नये संकल्प झलकते हैं, शिक्षण के प्रति उनके बदलते दृष्टिकोण का स्पष्ट संकेत मिलता है। अधिकांश शिक्षक अतिथि बनकर आते और अपने परिवार के सदस्य बनकर समाज के उत्थान के लिए संकल्पित होकर लौटते दिखाई दे रहे हैं।


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