आचार्य जी के युग निर्माणी संकल्पों को पूरा करे शिष्यों की श्रद्धा- शैल जीजी.
गायत्री साधकों ने हिमालय को बचाने के लिए साधना, वृक्षारोपण, गंगाशुद्धि व ज्ञान विस्तार के संकल्प लिए.



युग निर्माण योजना के सूत्र संचालक ऋषियुग्म परम पूज्य पं.श्रीराम शर्मा आचार्य एवं परम वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा के हजारों शिष्यों ने गुरुपूर्णिमा पर्व बड़ी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया। उत्तराखंड में आयी विनाशकारी आपदा को देखकर जहाँ लोग उत्तराखंड की ओर आने के लिए डरे- सहमे दिखाई देते हैं, वहीं शांतिकुंज में उपस्थित गायत्री साधकों में इन प्राकृतिक प्रतिकूलताओं से मानवजाति को उबारने का साहस- संकल्प उभरता दिखाई दिया। अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने पर्व का मुख्य संदेश देते हुए उपस्थित साधकों को परम सौभाग्यशाली बताया, जिन्हें पं.श्रीराम शर्मा आचार्य जी जैसे सद्गुरु मिले जो मानवजाति का भाग्य बदलने के लिए युगों- युगों बाद धरती पर आते हैं। उन्होंने हिमालय को ज्ञान का सुमेरू बताते हुए उत्तराखंड की विनाशकारी आपदा के प्रति गहन वेदना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि हिमालय भारत ही नहीं पूरे विश्व की आध्यात्मिक चेतना का ध्रुव केन्द्र है। हिमालय में युगों- युगों से तप कर रहे ऋषि- मनीषियों के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन और तप के परोक्ष प्रभाव से मानवीय संस्कृति की संरचना हुई है। हिमालय है तो संस्कृति है, हिमालय है तो हम सब हैं। हमें अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए ज्ञान के आगार हिमालय को सुरक्षित रखना होगा।

डॉ. प्रणव पण्ड्या ने उत्तराखंड की आपदा को मानवकृत बताते हुए इस विनाश लीला के प्रति गहन वेदना व्यक्त की। उन्होंने हिमालय को बचाने के लिए पाँच सूत्री योजनाएँ बतायीं। इनके अंतर्गत साधकों द्वारा दैनिक उपासना के समय हिमालय को मजबूत बनाने के भाव संप्रेषित करने, नदियों के प्रवाह को रुकने न देने- उनके तटों पर सघन वृक्षारोपण करने, निर्मल गंगा अभियान में भागीदार बनने, पर्यावरण जागरूकता के साथ सघन वृक्षारोपण और संरक्षण करने तथा युगऋषि के ज्ञान को घर- घर पहुँचाने के संकल्प दिलाये गये।

इससे पूर्व संस्था की अधिष्ठात्री शैल जीजी ने गुरुपूर्णिमा को श्रद्धा के आरोपण- आरोहण का पर्व बताया। उन्होंने कहा कि श्रद्धा जब उभरती है तो बूढ़े जटायु में भी संस्कृति की सीता की रक्षा के लिए रावण से टकराने का साहस उभर आता है। राम के रींछ- वानर समुद्र पर सेतु बनाने के लिए उत्साहित हो जाते हैं। शबरी अपने संचित बेर लेकर श्रीराम के चरणों में समर्पित करने चली जाती है। उन्होंने मानवता के उत्कर्ष के लिए परम पूज्य पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी एवं परम वंदनीया माताजी की भक्ति, अनुदान एवं युग के नवनिर्माण की विकल वेदना से जुड़े अनेक संस्मरणों को भावभरे अंतरूकरण से याद किया। युग निर्माण आन्दोलन को गति दे रहे शिष्यों की श्रद्धा को निरंतर पोषण- संरक्षण मिलता रहे, भगवान से ऐसी प्रार्थना के साथ श्रद्धेया जीजी ने अपने संदेश का समापन किया।

पर्व संदेश से पूर्व सत्संग भवन में डॉ. प्रणव पण्ड्या जी एवं शैल जीजी ने सद्गुरुदेव पं.श्रीराम शर्मा आचार्य जी एवं परम वंदनीया माताजी की प्रतिमाओं का भावभरा पूजन किया। इसका कर्मकाण्ड गायत्री किशोर त्रिवेदी एवं उदय किशोर मिश्र की टोली ने तथा मंच संचालन अरुण खंडागले ने किया। संगीत विभाग के युग गायकों की प्रस्तुति ने समारोह को भक्तिभाव से भर दिया। जीजी- डॉ. साहब ने ऊषावेला में गुरु की अनंत महिमा का बोध कराते हुए लगभग 3000 लोगों को गुरुदीक्षा दिलाई, जिसके कर्मकाण्ड का संचालन दिनेश पटेल एवं दिवाकर पारखे की टोली ने किया। दीक्षा लेने वालों में देव संस्कृति विश्वविद्यालय के विद्यार्थी और देशभर से आये युवाओं की संख्या ने उज्ज्वल भविष्य के प्रति आशा का संचार किया। पर्व मनाने करीब 20 हजार लोग शांतिकुंज में उपस्थित थे। ऋषियुग्म के स्मारकों और चरण पादुकाओं के प्रणाम का क्रम सायंकाल तक चलता रहा। सायंकाल दीपमहायज्ञ के साथ गुरुपर्व पर श्रोताओं में समाज के नवनिर्माण के संकल्पों को उभारा गया।

गायत्री परिवार द्वारा गुरुपूर्णिमा पर्व पर शांतिकुंज आये प्रत्येक साधक- श्रद्धालु को सीता अशोक एवं पीपल की पौध प्रसाद स्वरूप प्रदान करते हुए उसके रोपण, पालन और संरक्षण का निवेदन किया गया। शांतिकुंज उद्यान विभाग प्रभारी सुधीर भारद्वाज ने बताया कि ढाई हजार से अधिक लोगों को विभिन्न प्रकार के पौधे निरूशुल्क वितरित किये गये।

पं.श्रीराम शर्मा आचार्य जी की लिखी आठ पुस्तकों के मराठी अनुवाद, ‘हारियेहिम्मत’ पुस्तक के चीनी अनुवाद और वीडियो पत्रिका ‘युगप्रवाह’ के संशोधित संस्करण का विमोचन हुआ।











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