परम्परा नहीं, विवेक अपनाओ। पेड़- पौधों को सींचकर उन्हें सूखने से बचाओ

Published on 2018-05-31
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भगवान सदाशिव की अपने भक्तों (काँवड़ियों) से पुकार

हे मेरे प्यारे भक्तो! श्रावण का महीना समीप है। तुम्हारे हृदय में मुझसे कुछ माँगने की या मेरे उपकारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की हिलोरें तो उठने लगी होंगी। प्राणिमात्र का कल्याण करना मेरा सहज स्वभाव है, लेकिन तुम्हारी आस्था भी कम सराहनीय नहीं है। कई- कई दिनों के परिश्रम से गंगाजल लाकर मेरा अभिषेक करते हो, ताकि मैं तुमसे प्रसन्न रहूँ और तुम्हारी सहायता करूँ।

लेकिन मैं चाहता हूँ कि तुम अपनी भक्ति भावना को विवेकपूर्वक जनहित में लगाओ। उन दिनों स्वयं इंद्र भगवान मेरा अभिषेक करते हैं। फिर मुझे उस गंगाजल की आवश्यकता कहाँ रह जाती है? लाखों की भीड़, हल्ला- हुड़दंग, ध्वनि प्रदूषण आदि से तो मेरे अन्य भक्तों को तरह- तरह की कठिनाइयों का सामना भी तो करना पड़ता है।

तुम्हारी सेवा की वास्तविक आवश्यकता तो मुझे इन दिनों है, जब मेरे शाश्वत रूप पेड़- पौधे प्यासे हैं, मुरझा रहे हैं, सूख रहे हैं। क्या तुम अपनी वही आस्था इन दिनों जाग्रत् कर सकते हो? अपनी काँवड़ में दो- दो लोटे पानी प्रतिदिन ले जाकर किसी सूखते वृक्ष को सींच कर उसे बचा सकते हो? जब वृक्ष बचेंगे, तभी तो मैं पर्यावरण में घुला जहर पी सकूँगा, लाखों लोगों को प्राणवायु दे सकूँगा।

भक्तों का उपकार करना तो मेरा सहज स्वभाव है। तुम किसी भी प्रकार घाटे में नहीं रहोगे। इस कार्य में निकली पसीने की बूँदें गंगाजल से कहीं ज्यादा पवित्र और मुझे प्रसन्न करने वाली होंगी। तुम्हारी इस भक्ति से मैं पूरे समाज का उपकार कर सकूँगा, उन्हें अपने रौद्र रूप से बचा सकूँगा।

शिवभक्त हो, सबके लिए कल्याणकारी बनो।


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