Published on 2018-06-25
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देसंविवि की विकास यात्रा में एक नया अध्याय

हरिद्वार २५ जून।


देवसंस्कृति विश्वविद्यालय शांतिकुंज योग सहित कई क्षेत्रों में ख्यातिलब्ध संस्थान है। यहाँ नित नये प्रयोग के साथ योग, मनोविज्ञान, यज्ञ जैसे विषयों पर विशेष शोध कार्य चल रहे हैं, अब तक हुए शोधों ने समाज व राष्ट्र को नई दिशा व विचारधारा दी है। इसी क्रम में पिछले दिनों देसंविवि द्वारा इंटरडिसिप्लिनरी जर्नल ऑफ यज्ञ रिसर्च (आई.जे.वाय.आर.) नामक शोध पत्रिका के ऑनलाइन प्रकाशन के विधिवत आरंभ के साथ ही वि.वि. की विकास-यात्रा में एक नया अध्याय जुड़ गया।

भारत में वैदिक काल से ही दुनिया के लिए सबसे बड़ा उपहार एवं भारतीय संस्कृति में केंद्रीय विषय यज्ञ रहा है। यह न केवल जीवन जीने की एक शैली के रूप में शामिल है बल्कि इसका व्यापक अनुप्रयोग मानवीय-स्वास्थ्य, सामाजिक-कल्याण, कृषि-लाभ, पर्यावरण-शुद्धि व आध्यात्मिक प्रभाव सहित विभिन्न क्षेत्रों पर भी है।

                विज्ञान के आगे बढ़ने के प्रयास में यज्ञ अनुसंधान के प्रासंगिक क्षेत्रों में विद्वानों द्वारा किये अध्ययन के प्रसार एवं उन्हें साझा करने व यज्ञ-अनुसंधान के विभिन्न शोध प्रयासों को एकीकृत करने हेतु एक अंतरराष्ट्रीय मंच की आवश्यकता थी जो इस जर्नल के ऑनलाइन प्रकाशन से दुनिया भर के शोधकर्ताओं और विद्वानों को अंतः विषय यज्ञ-शोध से संबंधित शोध के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी मूल पांडुलिपियों को प्रस्तुत करने व प्रवर्तनकों, विशेषज्ञों, शिक्षकों और छात्रों के लिए भी अपने विचार, नए रुझान, विचार एवं विचारों को साझा करने हेतु एक व्यापक मंच प्रदान करता है, जिसका मूल उद्देश्य शोध जानकारी को तेज गति से नई सीमाओं में प्रसारित करने का है।

                यह एक सहकर्मी-समीक्षा पत्रिका है, जिसमें प्राथमिकता उन लेखों को दी जाएगी जो जर्नल के दायरे से संबंधित हैं, समय पर नए विचार लाते हैं और सामान्य रुचि रखते हैं एवं जिसका उद्देश्य उच्च शोध गुणवत्ता, समीक्षा, दृष्टिकोण और केस स्टडीज की उच्च गुणवत्ता को संवाद करना है तथा जो यज्ञ में वैज्ञानिक ज्ञान को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। आई.जे.वाय.आर. अपने समीक्षकों को अपने वर्तमान और भविष्य के विद्वानों के कार्यों में निरंतर सुधार के लिए लेखकों को पेशेवर, रचनात्मक और समय पर प्रतिक्रिया प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

                इस विशिष्ट आरम्भ के अवसर पर वि.वि. के श्रद्धेय कुलाधिपति डॉ० प्रणव पण्ड्या ने इस विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पत्रिका आधुनिक समय में यज्ञ संबंधी शोधों की आवश्यकता को पूर्ण करने में समर्थ है, वहीं प्रतिकुलपति डॉ० चिन्मय पण्ड्या ने भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान-विज्ञान को विकसित करने में यज्ञ के अतुलनीय योगदान की बात कही। साथ ही इसे अपने आपमें इस तरह का प्रथम एवं अभिनव प्रयास बताया। देसंविवि के यज्ञ अनुसंधान केंद्र, समन्वयक विरल पटेल इस शोध पत्रिका के कार्यकारी संपादन होंगे।


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