Published on 2018-07-25

जबलपुर शाखा लगा रही हैं १०,००० पौधे

बीज बम एक जापनी परम्परा

जबलपुर। मध्य प्रदेश
गायत्री परिवार जबलपुर द्वारा गायत्री जयंती से पर्यावरण संरक्षण- हरीतिमा संवर्धन के अंतर्गत एक नवीन प्रयोग 'बीजांकुर अभियान' की शुरुआत की गयी है। इसमें फलों और वृक्षों से प्राप्त बीजों को इकट्ठा कर सुखाया जाता है। इसके पश्चात दो तिहाई मिट्टी एवं एक तिहाई खाद को मिश्रित किया जाता है। इस मिश्रण में बीज को रखकर गोले बना लिए जाते हैं, जिन्हें बीज बम कहा जाता है। इन्हें कुछ समय धूप में, तत्पश्चात् छाँह में रखकर २४ घंटे सुखाया जाता है। इसके बाद इन्हें जंगलों में, नदी किनारे, खाली मैदानों में, खेत के किनारे स्थापित कर दिया जाता है। अर्थात् केवल रख दिया जाता है। वर्षा होने पर इनमें धीरे- धीरे अंकुरण होता है और समय आने पर यह बीज वृक्ष का रूप ले लेता है।
वस्तुत: यह पुरानी जापानी पद्घति है। इसके उपयोग से वहाँ पर वृक्ष बड़ी मात्रा में है। आँकड़ों के अनुसार जापान में प्रति व्यक्ति ८००० वृक्ष हैं, वही भारत में सबसे कम, प्रति व्यक्ति २८ पेड़ हैं। संस्कारधानी जबलपुर में गायत्री परिजनों द्वारा इस पद्घति को अपनाते हुए इस वर्षाकाल में १०००० बीज गोलों की स्थापना का क्रम चालू किया गया है।

माता भगवती की बाड़ी
हर व्यक्ति द्वारा अपनाये जाने योग्य एक अनुभूत प्रयोग
गायत्री परिवार के परिजन हर क्षेत्र में वृक्षगंगा अभियान को गति देने के लिए अथक परिश्रम कर रहे हैं। इस अभियान को अधिक प्रभावशाली और सफल बनाया जा सकता है 'माता भगवती की बाड़ी' योजना को अपनाते हुए।

इस कार्य में संलग्न परिजन भलीभाँति जानते हैं कि पौध को विकसित कर पेड़ बनाने की तीन प्रमुख प्रक्रिया हैं- १.सुरक्षा २़ सिंचन- पोषण ३़ उस पौधे के प्रति संवेदना जगाना। 'माता भगवती की बाड़ी' योजना एक ऐसी योजना है, जिसमें घर के आँगन, छत, स्कूल आदि सार्वजनिक स्थानों की खाली पड़े सुरक्षित स्थान का प्रयोग करते हुए पौधों को बड़े बैग, गमले, पुराने डब्बे, मटके, सुराही आदि में २ से ३ वर्ष तक विकसित करते हुए उन्हें ५ से ७ फीट तक की लम्बाई तक बड़ा किया जा सकता है। इनमें बारिश के समय यहाँ- वहाँ उगे नन्हें पीपल, बड़, नीम, गूलर, के पौधे या बीजों को रोपा जा सकता है।

करना क्या होगा?
इस प्रक्रिया को अपनाने से पौधे की सुरक्षा और सिंचाई करना, खाद देना आसान हो जाएगा। ५ से ७ फीट के बड़े पेड़ जब खेत की मेंड, सड़क के किनारे, खुले स्थान, पहाड़ी, जंगल आदि में रोपे जाएँगे तो वे बिना ट्रीगार्ड के भी आसानी से सुरक्षित रह सकेंगे, खाद- पानी की आवश्यकता भी अपेक्षाकृत कम हो जाएगी। २- ३ वर्ष तक पौधे की सेवा करने के बाद उसके प्रति संवेदना बढ़ना स्वाभाविक है। इस अपनत्व के नाते लगाने वाले में उसकी सुरक्षा का भाव बढ़ेगा।

यह योजना पिछले कुछ वर्षों में अनेक स्थानों पर अपनाई गई है, जिसके बहुत शानदार परिणाम मिले हैं। हर परिजन को प्रयास करना चाहिए कि वह ५ से लेकर २० तक पौधे इस प्रकार अवश्य विकसित करे। इससे पौध की उपलब्धता सरल होगी, वृक्षगंगा अभियान को भी कई गुना गति मिलेगी।


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