Published on 2018-08-03

व्यक्तित्व में समाये देवत्व को जगाने का आह्वान

विद्यार्थियों को शिक्षा एवं संस्कार द्वारा परमात्मा से जुड़ने और जोड़ने का कार्य देव संस्कृति विश्वविद्यालय द्वारा किया जा रहा है। - स्वामी विश्वेश्वरानन्द जी

ज्ञानार्जन का उद्देश्य है अपने व्यक्तित्व का परिष्कार। यहाँ शिक्षा आपका आत्मबल बढ़ायेगी। आप स्वयं अपने जीवन में बदलाव अुनभव करेंगे।-
श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी

देसंविवि में संचालित ३६ पाठ्यक्रमों में लिथुआनिया, दक्षिण कोरिया, चीन, वियतनाम, आॅस्ट्रेलिया, ईरान, आयरलैण्ड व नेपाल के अलावा देश के २० राज्यों के ४४२ नवप्रवेशी छात्र- छात्राओं को दीक्षित किया गया।

इस दुनिया में सबसे मूल्यवान है ज्ञान। ज्ञान ही पशु और मनुष्य में अंतर पैदा करता है। मेरे प्यारे बच्चो! हम आपको श्रेष्ठ मनुष्य बनाना चाहते हैं। नर- तन में छिपी श्रेष्ठ विभूतियों को उभार महानता की ओर अग्रसर करना चाहते हैं।

२९ जुलाई को देव संस्कृति विश्वविद्यालय के ३३वें ज्ञानदीक्षा समारोह की अध्यक्षता करते हुए कुलाधिपति श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने इन विचारों के साथ ज्ञानदीक्षा के अनुबंध- अनुशासनों के संकल्प दिलाए।
हरिद्वार स्थित महामंडलेश्वर स्वामी विश्वेश्वरान्द गिरि जी महाराज ज्ञानदीक्षा समारोह के मुख्य अतिथि थे। उन्होंने देव संस्कृति विश्वविद्यालय द्वारा प्राचीन विश्वविद्यालयों की पावन परम्परा को पुनर्जीवित करने की पहल का स्वागत किया। उन्होंने परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का भावभरा स्मरण करते हुए कहा कि देव संस्कृति विश्वविद्यालय एक कल्पवृक्ष है, जहाँ अध्यात्म का मर्म समझने और जीवन को सही दिशा देने का अवसर विद्यार्थियों को मिलाता है।

श्रद्धेय डॉ. साहब ने कहा कि ज्ञान का तात्पर्य पुस्तक रटने से नहीं है, सद्गुरु की चेतना से जुड़कर प्राप्त किया गया वह ज्ञान जो विवेक जगाए, भ्रम, भटकाव, वासना, तृष्णा, लोभ, मोह, अहंकार से मुक्ति दिलाए, जीवन में उदारता, प्रेम, विनम्रता का संचार करे, वही सच्चा ज्ञान है। अध्यात्म के यथार्थ स्वरूप के अवलम्बन से ही यह संभव है। युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के सपनों के इस विश्वविद्यालय में उनकी चेतना, तप की ऊर्जा और उनका सान्निध्य लाभ प्राप्त शिक्षकों के माध्यम से यह दिव्य ज्ञान यहाँ आप प्राप्त कर सकते हैं।

ज्ञानदीक्षा समारोह का आरंभ मुख्य अतिथि स्वामी विश्वेश्वरानंद जी महाराज और श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी द्वारा दीप प्रज्वलन, देव पूजन, अतिथि स्वागत से हुआ। विवि के कुलगीत के उपरान्त कुलपति श्री शरद पारधी जी ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने नव प्रवेशी विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए सच्चे, अच्छे, सर्वांगपूर्ण मनुष्य बनने की प्रेरणा दी।

डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी ने ज्ञानदीक्षा की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। उन्होंने नवप्रवेशी विद्यार्थियों को एक विशाल देव परिवार का सदस्य बनने पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि धनवान को कोई याद नहीं रखता, लेकिन जो भगवान के कार्यों में सहयोगी बनते हैं उनका नाम इतिहास में चिरकाल तक याद किया जाता है। आज समाज और संस्कृति ऐसे ही महामानवों को तलाश रही है।

श्री उदयकिशोर मिश्रा और मंच संचालक श्री गोपाल शर्मा ने ज्ञानदीक्षा का कर्मकाण्ड सम्पन्न कराया। कुलाधिपति जी ने आर्षग्रंथों के मार्मिक सूत्र दोहरवाते हुए अनुशासन का पालन करने, वर्जनाओं से बचने के संकल्प विद्यार्थी एवं आचार्यों को दिलाए।

अतिथियों के प्रेरणाप्रद उद्बोधन के उपरांत विद्यार्थियों को देव संस्कृति विवि. के प्रतीक चिह्न धारण कराए गए। विवि. की रिसर्च जर्नल एवं संस्कृति संचार के नवीन संस्करण का विमोचन मंचासीन गणमान्यों ने किया। इस अवसर पर संत विज्ञानानंद, व्यवस्थापक श्री शिवप्रसाद मिश्र, देसंविवि के कुलसचिव श्री संदीप कुमार जी, समस्त आचार्यगण, शांतिकुंज परिवार के वरिष्ठ सदस्य तथा देश- विदेश के कोने- कोने से आये विद्यार्थी एवं उनके अभिभावकगण उपस्थित थे।


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