Published on 2018-08-10

अंतर जगत की आँख खोलने का नाम है ध्यान ः डॉ पण्ड्या

देसंविवि के मृत्युजंय सभागार में विद्यार्थियों को कराया ध्यान

हरिद्वार 10 अगस्त।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या ने कहा कि अंतर जगत की आँख खोलने का नाम है ध्यान। इसके माध्यम से ही अपने अंदर झांका जा सकता है। जिसके अंदर बोधतंत्र व ज्ञानतंत्र में तालमेल बैठ जाये, ऐसी एकाग्रता ध्यान के उत्तम चरण कहलाता है।      वे देसंविवि के मृत्युंजय सभागार में आयोजित ध्यान की विशेष कक्षा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ध्यान स्थिर होकर करना चाहिए। ध्यान से एकाग्रता बढ़ती है और आंतरिक गुणों का विकास होता है, जो सफल होने के लिए आवश्यक है। स्वामी विवेकानंद, परम पूज्य पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी आदि सिद्धपुरुष अपने शिष्यों के विकास के लिए नियमित रूप से ध्यान की गहराई में गोता लगाने के लिए प्रेरित करते रहे। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भी ध्यान के माध्यम से अपने मन की एकाग्रता बढ़ाकर सफलता प्राप्त की सकती है। उन्होंने कहा कि जब कभी भी कोई तनाव या भावनात्मक पीड़ा हो, तो उसे जितनी जल्दी हो सके ध्यान साधना या किसी अन्य विधि से ठीक कर लेना चाहिए, ताकि अपना निर्धारित लक्ष्य-मंजिल से दूर न हो।
      संगीत विभाग के भाइयों ने ‘आत्म साधना ऐसी हो, जो चटका दे चट्टान को .....’ गीत से विद्यार्थियों को ध्यान-साधना की ओर अपना पग बढ़ाने के लिए हौसला बढ़ाया, तो वहीं श्रद्धेय डॉ. पण्ड्या जी ने गीता व अन्य आर्षग्रंथों के विविध उदाहरणों के माध्यम से छात्र-छात्राओं को उल्लसित किया। इस अवसर पर विद्याथियों ने अपनी विविध शंकाओं का सरल व सहज समाधान पाकर प्रसन्न नजर आये।
      यहाँ बताते चलें कि देसंविवि में विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम के अलावा उन्हें जीवन जीने की कला आदि भी सिखाई जाती है। इनमें कुलाधिपति डॉ. पण्ड्या गीता, ध्यान की कक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ-साथ जीवन में सफल होने के विविध सूत्र बताते हैं। इस अवसर कुलपति श्री शरद पारधी, प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या, कुलसचिव श्री संदीप कुमार सहित समस्त विभागाध्यक्ष, शिक्षक-शिक्षिकाएँ, नवांगतुक एवं पूर्व में प्रवेश प्राप्त विद्यार्थी गण उपस्थित रहे।


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