Published on 2018-08-20
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स्वार्थ भाव त्याग समाज के लिए जीवन जीना सीखना होगा।- श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्याजी

हमारे पूर्वजों ने राष्ट्रप्रेम की जिन उदात्त भावनाओं के वशीभूत होकर देश को अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद कराया, आज राष्ट्र के स्वस्थ विकास के लिए उन्हीं भावनाओं के पुनर्जीवन की आवश्यकता है। युवाओं को प्रचलित प्रवाह को चीरकर आदर्शोन्मुख जीवन जीना होगा। उन्हें समाज, राष्ट्र और संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए आगे आना होगा।

दिया, दिल्ली की मुखर्जीनगर शाखा विगत कई वर्षों से दिल्ली में आकर यूपीएससी की परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों की साप्ताहिक कक्षाएँ लेकर उनमें यही जुनून पैदा कर रही है। उन्हें अध्यात्म के वास्तविक स्वरूप का बोध करा रही है, परम पूज्य गुरुदेव के बताये सूत्रों से उनके जीवन को श्रेष्ठता के साँचे में ढाल रही है। इसी क्रम में दिया शाखा संचालक श्री मनीष कुमार वर्ष में एक बार नए जुड़े परिजनों को शांतिकुंज भी लाते हैं। उन्हें आध्यात्मिक जीवन के आदर्श स्वरूप के दर्शन कराते हैं।

इस वर्ष वे २५० प्रबुद्ध युवाओं को शांतिकुंज लाये। १० से १२ अगस्त की तारीखों में उनका विशेष शिविर आयोजित हुआ। श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी, श्रद्धेया जीजी, श्रद्धेय श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी, डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी सहित अनेक वरिष्ठ जनों ने उनका मार्गदर्शन किया। श्रद्धेय डॉ. साहब ने अपने उद्बोधन में गीता के 'क्षुद्रं हृदय दौर्बल्यं ...' संदेश की व्याख्या आज की परिस्थितियों में करते हुए कहा कि युवा वह है जो प्रवाह में बहने की अपेक्षा औचित्य को समझता और धाराओं को चीरते हुए नई पीढ़ी को सही मार्ग दिखाता है। पैसा, पेट और प्रजनन के लिए तो लाखों युवा आते- जाते हैं लेकिन जो अपने जीवन से नई राहें बना जाते हैं, वे धन्य हो जाते हैं। हमें स्वार्थभाव त्यागकर समाज के लिए जीवन जीना सीखना चाहिए। यह कठिन नहीं है, बस हृदय की दुर्बलता छोड़कर संकल्पपूर्वक आगे आने की आवश्यकता है।

शांतिकुंज आये प्रबुद्ध युवाओं ने यहाँ की दिनचर्या- यज्ञ, योग, ध्यान सहित दैनिक गतिविधियों में बड़े उत्साह के साथ भाग लिया और अनुभव किया कि अध्यात्म मात्र कर्मकाण्ड नहीं, एक जीवन शैली है जो जीवन को आनन्द और उल्लास से भर देती है। शिविर संचालन शांतिकुंज के युवा प्रकोष्ठ ने किया।


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