Published on 2018-09-13
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आत्महत्या करने पर उतारू युवक, अब बदल रहा है औरों का जीवन

मधुबनी, बिहार के गाँव हथियाही निवासी लगभग २० वर्षीय युवक आलोक कुमार की आत्मकथा

१०वीं पास करने के बाद मैं पढ़ने पटना आया। वहाँ कुछ गलत दोस्तों की संगत में आ गया। तब शराब बंदी नहीं थी। मैं शराब का सेवन करने लगा। तब मैंने कोटा, राजस्थान आकर कोचिंग करने का निश्चय किया। सोचा था पढ़ाई के लिए वातावरण मिलेगा तो घर, परिवार वालों के लिए कुछ भला करूँगा, लेकिन वहाँ तो सिगरेट, गाँजा जैसी अनेक लतों में फँसता ही गया।
मेरे माता- पिता मेरे भविष्य के लिए चिंतित थे। उन्होंने डोनेशन देकर मेरा एडमिशन बीआईईटी, दादरी में इंजीनियरिंग में करा दिया। लेकिन एक बार गलत संगत में फँसने के बाद गाड़ी लाइन पर कहाँ आने वाली थी। मैं नशे के साथ मानसिक उद्वेग, वासना, मन की अस्थिरता के भँवर में फँसता ही जा रहा था। परिणाम यह रहा कि प्रथम वर्ष के सभी छ: विषयों में अनुत्तीर्ण हो गया।

मैं पढ़ाई छोड़कर घर आ गया। वहाँ सभी घरवाले मुझसे नाराज रहने लगे। कोई बात ही नहीं करता। जिन माता- पिता ने अपनी जमीन बेचकर मेरी पढ़ाई की व्यवस्था की थी, वे मुझे इस बिगड़े रूप में देखकर भला खुश कैसे रह सकते थे। हताश- निराश होकर मैं पटना आ गया। सोचा ट्यूशन आदि कर मैं अपना जीवनयापन कर लूँगा। पर मैं कुछ नहीं कर सका।

मैं पूरी तरह से टूट चुका था और आत्महत्या करने का मन बना चुका था। शायद दो दिन के भीतर ही आत्महत्या कर लेता, यदि प्रज्ञा युवा प्रकोष्ठ पटना द्वारा संचालित साहित्य स्टॉल पर न पहुँचता। वहाँ के एक भैया ने मेरे बुझे चेहरे को देखकर पूछा, परेशान हो? कल गायत्री शक्तिपीठ पटना पर आ जाना, तुम्हारी सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा।

मैं उनके प्रेम और व्यवहार से बहुत प्रभावित हुआ। अगले दिन शक्तिपीठ पर चलने वाली मोटिवेशनल क्लास में भाग लिया, जिसे मनीष कुमार संबोधित कर रहे थे। पहली ही कक्षा में मेरे विचार बदल गये। जीने की आस बँधी। मैंने उनका सात दिन का मोटिवेशनल कोर्स किया। अब तो मैं पूरी तरह से बदल गया था। नशे की आदतों पर लगाम लग गई थी। गुरुदेव के साहित्य के प्रति आकर्षण बढ़ा था, साधना भी आरंभ कर दी।
थोड़े दिनों बाद शांतिकुंज आया, संजीवनी साधना सत्र किया। यहाँ से लौटा तो पूरा जीवन बदला हुआ था। नशा नाममात्र का रहा था। घर के कामों में पूरी रुचि लेने लगा। जीवनचर्या व्यवस्थित हो गई। इस परिवर्तन को देखकर घरवाले भी गद्गद थे। उनका प्यार मिला तो हौसला और बढ़ गया।

मैं एक मासीय युगशिल्पी सत्र में शांतिकुंज आया। अब मैं पूरी तरह से व्यसनमुक्त हूँ और उत्साह से लबरेज़ हूँ।

अब मैं प्रज्ञा युवा प्रकोष्ठ पटना के 'युवा पकड़ो आन्दोलन' से जुड़ गया हूँ। अपनी तरह हताश, निराश, भूले- भटके जो भी युवा दिखाई देते हैं उन्हें इस आन्दोलन से जोड़ रहा हूँ। इस कार्य में मुझे जिस आनन्द की अनुभूति हो रही है वह शब्दों में बता नहीं सकता। अब मैं स्वयं वहाँ की मोटिवेशनल क्लासों में जाता हूँ और अपने जीवन का उदाहरण देते हुए उनका जीवन सँवाने में गौरव की अनुभूति करता हूँ।


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