Published on 2018-09-27 HARDWAR
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हरिद्वार 29 सितंबर।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या ने कहा कि काम व क्रोध मानव जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है। क्रोध से व्यक्ति का रक्त संचार बढ़ जाता है और यह मस्तिष्क के साथ-साथ शरीर को भी हानि पहुँचाता है। क्रोध से बुद्धि का नाश होता है और मनुष्य अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण खो देता है।

                श्रद्धेय डॉ. पण्ड्या देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के मृत्युंजय सभागार में आयोजित गीतामृत की विशेष कक्षा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के जीवन की असली परीक्षा क्रोध में होती है। उसके अंदर क्रोध जागते ही असुर जाग जाता है और जिससे उनकी प्रवृत्ति विनाशकारी बन जाती है। उन्होंने कहा कि क्रोध को सत्संग और आत्म नियंत्रण द्वारा जड़ से मिटाया जा सकता है। क्रोध की समाप्ति ही मानव जीवन की उन्नति है। उन्होंने कहा कि काम अर्थात कामनाएँ, इच्छाएँ, वासना आदि। यह बलवान शत्रु है और जब वह मनुष्य पर आक्रमण करता है, तब वह धर्म और दया भूल जाता है और वह मन पर आश्रित हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि धर्म व विवेक से इन दोनों पर काबू पाया जा सकता है। श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने काम व क्रोध पर विजय पाने के लिए विविध उपाय सुझाये हैं।

                इससे पूर्व युगगायकों ने ‘आत्म साधना ऐसी हो, जो चटका दे चट्टान को..’’ गीत को सितार, वाइलिन आदि वाद्ययंत्रों से प्रस्तुत कर उपस्थित छात्र-छात्राओं, शिक्षक-शिक्षिकाओं, देसंविवि व शांतिकुंज के अनेक कार्यकर्त्ता को उल्लसित किया। इस अवसर पर कुलपति श्री शरद पारधी, प्रति कुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या, कुलसचिव श्री संदीप कुमार सहित समस्त विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर्स, विद्यार्थी आदि उपस्थित रहे। 


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