Published on 2018-10-12 HARDWAR

हरिद्वार 11 अक्टूबर।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या ने कहा कि ध्यान निरंतर करते रहना चाहिए। ध्यान में गोता लगाना चाहिए। ध्यान से अर्जन होता है, दुर्गुणों का विर्सजन होता है और फिर विवेक, सामर्थ्य व अतिन्द्रिय क्षमताओं का सृजन होता है।

                वे देव संस्कृति विश्वविद्यालय में आयोजित नवरात्र साधना पर आयोजित गीतामृत की विशेष कक्षा को संबोधित कर रहे थे। कुलाधिपति ने कहा कि माँ शैलपुत्री देवी सती थी, जिनकी वर्षों की तपस्या के कारण उनका हिमालय राज के घर के माँ पार्वती के रूप में जन्म हुआ। शैल का अर्थ है- पाषण। ध्यान के द्वारा मन रूपी पाषाण को भेद कर चेतना का विकास किया जा सकता है। ध्यान मन की एकाग्रता, स्थिरता व आंतरिक क्षमता को बढ़ाता है। ध्यान से व्यक्तित्व का निर्माण किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ध्यान हमेशा पवित्र स्थानों में किया जा चाहिए, जिससे उस स्थान की सकारात्मकता का प्रभाव साधक पर पड़े। सांसारिक ध्यान से साधक केवल मोह, माया के बंधन ही रहता है। परन्तु परमात्मा का ध्यान मोक्ष प्राप्ति का साधन है। उन्होंने कहा कि नवरात्र में मातृशक्ति की उपासना के साथ ध्यान करने से साधक का चहुँमुखी विकास होता है। इसके साथ ही उन्होंने ध्यान में गोता लगाने के विविध पहलुओं की विस्तार से जानकारी दी।

                विवि में नवरात्र में युवाओं के शंका समाधान के साथ उनके आध्यात्मिक विकास की विशेष पहल की जाती है। जिससे युवाओं का न केवल शैक्षणिक विकास हो, वरन् उनमें आध्यात्मिकता का भी समावेश हो।

                इससे पूर्व युगगायकों ने ‘साधक का सविता को अर्पण..’’ गीत को सितार, वाइलिन, बांसुरी आदि वाद्ययंत्रों से प्रस्तुत कर उपस्थित छात्र-छात्राओं, शिक्षक-शिक्षिकाओं, देसंविवि व शांतिकुंज के अनेक कार्यकर्त्ता को उल्लसित किया। इस अवसर पर कुलपति श्री शरद पारधी, प्रति कुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या, कुलसचिव श्री संदीप कुमार सहित समस्त विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर्स, विद्यार्थी आदि उपस्थित रहे।


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