Published on 2018-10-13 HARDWAR

हरिद्वार १३ अक्टूबर।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि नवरात्र अनुष्ठान के दिनों में जप के साथ ध्यान साधना और आसन का विशेष लाभ मिलता है। ध्यान मेरुदण्ड को सीधा रखकर करना चाहिए। इसके कई फायदे होते हैं।

वे देसंविवि में नवरात्र साधना में जुटे युवाओं का मार्गदर्शन कर रहे थे। कुलाधिपति जी ने कहा कि महर्षि पतंजलि ने कहा है स्थिरम् सुखम् आसनम्। आसन की वह स्थिति जिसके माध्यम से विचारों को स्थिर कर सरलतापूर्वक ध्यान किया जा सके। आसन आध्यात्मिक रूप से ध्यान में रमण करने की ओर पहला कदम है। आसन ध्यान में लीन होने का सर्वोत्तम उपाय है। अपने कई दशकों के अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जब हम किसी आसन में परिपक्व हो जाते हैं, तो उसे आसन सिद्धि कहा जाता है। आसन सिद्धि के माध्यम से शरीर को आराम मिलता है, मन विश्राम करता है एवं ऊर्जा पूरी तरह से जीवंत और संतुलित रहती है। जब कोई साधक सिद्धासन में बैठकर जप, तप, ध्यान, साधना करता है, तो उसमें परम पिता के विराट भाव को समझने की क्षमता का विकास होता है।

कुलाधिपति ने कहा कि प्रतिभा-पराक्रम, मनोयोग और साहस से बनती है। ध्यान साधना जब साकार होती है, तब प्रतिभा जागती है। अध्यात्म क्षेत्र के साधक में सबसे पहले यही गुण जगाती है। प्रतिभा के विकसित होने के कारण नर्वस सिस्टम की सक्रियता बढ़ने लगती है और वह प्रकाशवान हो जाता है। उन्होंने कहा कि प्रतिभा को विकसित करने के बाद अतीन्द्रिय क्षमता की बारी आती है। उपार्जनों और उपलब्धियों के पीछे इन्हीं क्षमताओं का संयोग काम करता है। उन्होंने कहा कि प्रतिभा विकसित कर अतीन्द्रिय क्षमता के पश्चात बारी आती है आत्म जागृति की। आत्म जागृति खुद को समझकर जानने को कहा गया है। अगर भगवान को प्राप्त करने की साधना कठोर और कष्टपूर्ण लगती है तो यह दोष भगवान का नहीं जीवन नीति का है। जीवन वासना रहित और पवित्र बना रहता है तो कठिन कर्तव्य और कठिनाइयों से भरे जीवन में भी मस्ती का आनंद लिया जा सकता है।

इस अवसर पर शांतिकुंज, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान एवं देसंविवि परिवार के अलावा बड़ी संख्या में नवरात्र साधना करने आये साधक उपस्थित रहे।


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