Published on 2018-10-17 HARDWAR

हरिद्वार १६ अक्टूबर।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में चल रहे नौ दिवसीय नवरात्र साधना-स्वाध्याय सत्र में कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या ने जीवन में अनुशासन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि रजोगुण एक क्रिया है, तमोगुण में निष्क्रियता है और सतोगुण प्रकाश का प्रतीक है। साधक के अंदर जो अतिरिक्त रजोगुण है, उसका संहार नवरात्र साधना के दौरान साधक को मिलता है। जिसे साधक के जीवन में वासना से मुक्ति मिलती है। गीता के छठवें अध्याय के १६वें श्लोक पर व्याख्या करते हुए डॉ. पण्ड्या ने कहा कि आज मनुष्य अंदर से दुःखी है, बहुत ज्यादा परेशान है। बाहर से तो वह हंसता रहता है, परन्तु अंदर से वह रोता है। अध्यात्म चिकित्सा और योग के माध्यम से इन दुःखों से वे मुक्त हो सकता है, किन्तु आपाधापी भरी जीवन शैली के कारण आज अधिकतर लोगों की जीवनचर्या अस्त-व्यस्त हो गयी है। जब तक जीवनचर्या प्रकृति के अनुसार नहीं होगी, तब तक भीतर से आनंद आना संभव नहीं है। योग मन को संतुलित कर तप, संयम के माध्यम से समत्व की ओर ले जाता है।

                उन्होंने कहा कि आसन, प्राणायाम और मुद्रा सूक्ष्म और स्थूल प्राण प्रवाह को सही करती है। जिससे देह को शुद्धता, प्राण को परिष्कृत और ध्यान के माध्यम से एकाग्रता साधक के जीवन में आता है। उन्होंने कहा कि योगी प्राण को पुष्ट करता है और अपने आपको परिष्कत भी। इसीलिए योग के माध्यम से व्यक्ति को अनुशासित जीवन शैली जीनी चाहिए।

                इससे पूर्व कार्यक्रम की शुरुआत में कुलाधिपति ने ‘हे गुरुवर, हे जग जननी माँ ..’ गीत गाकर साधकों को भक्ति के रंग में डूबो दिया। इस अवसर पर कुलपति श्री शरद पारधी, प्रति कुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या, कुलसचिव श्री संदीप कुमार सहित समस्त विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर्स, विद्यार्थी आदि उपस्थित रहे। साथ ही देश-विदेश से आये नवरात्र साधकों ने देवसंस्कृति विवि के मृत्युंजय सभागार में स्वाध्याय सत्र में भाग लिया।


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