नैष्ठिक प्रयासों ने चूमा असाधारण सफलता का शिखर 1.महिलाओं और बच्चों की अलग कक्षाएँ लगीं 2.बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में आपदा प्रबंधन सेवाओं से भी प्रभावित थे. 3.एक वर्ष तक चलती रहेंगी कार्यशालाएँ. 4.हर प्रोडक्शन हाउस में सद्वाक्यों के बैनर लगाये जायेंगे. 5.सेंट्रल एनाउंसमेंट सिस्टम लगेगा, हर शिफ्ट में प्रार्थना होगी.6.कम्पनी के अंदर तक जायेगा ज्ञानरथ. गायत्री परिवार बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में व्यक्तित्व परिष्कार के विविध उपक्रम चलाकर वहाँ के अधिकारी- कर्मचारियों के व्यक्तित्व में आध्यात्मिक एवं नैतिकता का संचार करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहा है। इसी क्रम में हरिद्वार के निकट लक्सर स्थित एक विशाल औद्योगिक संस्थान बिड़लाटायर्स में असाधारण सफलता मिली, जो एक अनुकरणीय आदर्श है। यह सुयोग बिड़लाटायर्स के ही एक कर्मचारी और गायत्री परिवार के नैष्ठिक परिजन श्री कमलेश पालीवाल की पहल से बना। उन्होंने शांतिकुंज प्रतिनिधियों की अपने उच्चाधिकारियों से भेंट कराते हुए इस प्रकार की कार्यशालाएँ आयोजित करने की अनुमति चाही। कम्पनी ने प्रयोग के तौर पर अनुमति प्रदान की। एक कर्मचारी को 4 दिन की कार्यशाला में आठ घंटे भेजने की अनुमति उनसे मिली। ऐसे 70- 70 कर्मचारियों की दो कार्यशालाएँ 25 से 28 मार्च की तारीखों में आयोजित हुईं। शांतिकुंज को ही नहीं, कम्पनी के अधिकारियों को भी इसमें भाग लेने वाले अपने कर्मचारियों की बदली मानसिकता ने प्रभावित किया। अतः यह क्रम अगले माह भी दोहराने की अनुमति मिली और नैतिक शिक्षा प्रशिक्षण का यह क्रम निर्बाध रूप से चल पड़ा, जो अगले एक वर्ष तक चलता रहेगा। शांतिकुंज प्रतिनिधियों ने पहले ही शिविर में जनमानस को बदलने की अपनी निष्ठा और मनोयोग का जो परिचय दिया था, उसने ही क्रमशः सफलता की बुनियाद रखी। वे हर कार्यशाला में ही नहीं, हर क्षण लोगों की मानसिकता को परिष्कृत करने का प्रयास करते रहे। अनुमति मिलने के साथ ही देव संस्कृति विश्वविद्यालय के युवा प्रकोष्ठ से संपर्क कर कार्यशाला का व्यवस्थित पाठ्यक्रम बनाया। श्री अंकुर मेहता, गोपाल शर्मा, आशीष पंवार, संतोष वर्मा, सौरभ मिश्रा, जीएजैदी और युवा प्रकोष्ठ के श्री आशीष सिंह की समग्र योजना में भागीदारी रही। इस कार्यशाला का पाठ्यक्रम कर्मचारियों के स्वास्थ्य और उनके परिवारों की भलाई तथा कम्पनी प्रबंधन के साथ सद्भावना के विस्तार पर केन्द्रित रहा। प्रतिभागियों को जीवन प्रबंधन, योग, ध्यान, तनाव प्रबंधन, व्यसन मुक्ति की प्रेरणाएँ बहुत अच्छी लगीं और उन्होंने इन्हें अपनाने की प्रशंसनीय पहल भी की। पहली कार्यशाला में कम्पनी प्रबंधन और कर्मचारियों से जो आत्मीयता मिली, उसका लाभ अगली कार्यशाला में मिला। शांतिकुंज प्रतिनिधियों को प्रतिदिन शांतिकुंज से आने- जाने में व्यर्थ होने वाले समय का सदुपयोग कम्पनी परिसर में रहकर ही करने की अनुमति मिल गयी। उन्होंने बचे समय में आवासीय परिसर में जाकर वहाँ की बहिनों से संपर्क किया। उनके समूह बनाकर उनकी भी कक्षाएँ ली गयीं। बच्चों के लिए बाल संस्कार शालाएँ चलाई गयीं। शांतिकुंज प्रतिनिधियों की सूझबूझ और गुरुनिष्ठा के परिणाम स्वरूप चार- पाँच दिन के सीमित समय में ही कर्मचारी और उनके परिवारों के नैतिक उत्कर्ष के कई गुना प्रयास हुए। उल्लेखनीय है कि गायत्री परिवार द्वारा लक्सर क्षेत्र में साल- दर साल चलाये जाने वाले राहत कार्यों के कारण सभी कर्मचारी उससे अच्छी तरह परिचित हैं। अब जीवन के उत्थान के लिए वे शांतिकुंज को नयी आशाओं के साथ देख रहे हैं। ऐसा फीडबैक पहले कभी नहीं मिला.हमने शांतिकुंज के कार्यकर्त्ताओं को सबसे पहले 150 लोगों के लिए व्यक्तित्व परिष्कार शिविर लगाने की अनुमति दी थी। मैंने पहले शिविर के बाद अपने एक कर्मचारी से शिविर का फीडबैक लेना चाहा। उससे पूछा-तुमको प्रोग्राम कैसा लग रहा है। उसने जेब से अपना गुटके का पाउच निकाला और मुझे दे दिया। कहने लगा, अब हम कभी गुटका नहीं खायेंगे। इस शिविर से अपने कर्मचारियों में आये परिवर्तन को देखकर मैं दंग रह गया। अपने 30 वर्षों के कैरियर में ऐसा फीडबैक मुझे पहले कभी नहीं मिला।  श्री अखिलेश सिन्हा, सीईओ, बिड़ला टायर्स


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