Published on 2019-05-24 HARDWAR
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देसंविवि पढ़ायेगा दिव्यांग बच्चों को
शांतिकुंज में चल रहा है भासंज्ञाप का विशेष सम्मान समारोह

हरिद्वार 22 मई।
शांतिकुंज द्वारा देश भर में आयोजित होने वाली भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा में प्रांत व राष्ट्रीय स्तर प्रावीण्य सूची में आये विद्यार्थियों का शांतिकुंज में विशेष सम्मान समारोह हुआ। इस समारोह में दिल्ली, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, उप्र राज्यों के सैकड़ों छात्र-छात्राएँ भागीदारी कर रहे हैं। तीन दिन चलने वाले इस सम्मान समारोह का कई शिक्षाविद् व विषय विशेषज्ञ मार्गदर्शन किया। भेंट परामर्श के क्रम में अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख डॉ.प्रणव पण्ड्या व संस्था की अधिष्ठात्री शैलदीदी ने बच्चों को उत्साहवर्धन करते हुए आगे बढ़ने के विविध सूत्रों की जानकारी दी।
                सम्मान समारोह में गुजरात से आए सात दिव्यांग बच्चों ने भी प्रावीण्य सूची में अपना स्थान बनाया है। इन्होंने आज देसंविवि के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या से अनौपचारिक भेंट की। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि जरूरतमंदों की पीड़ा में हरसंभव सहयोग करने वाला शांतिकुंज-देवसंस्कृति विश्वविद्यालय परिवार चयनित दिव्यांग बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठायेगा। गुजराज में सूरत के रहने वाले सिकन्दर कुर्मा को चलने-फिरने में काफी दिक्कत है। सिकन्दर ने प्रभु कालेज सूरत से बीसीए 78 प्रतिशत अंक के साथ उत्तीर्ण किया। सिकन्दर के पिता की आर्थिक स्थिति कमजोर है। वे रेहड़ी चलाकर अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। इसी कारण सिकन्दर एमसीए की पढ़ाई नहीं कर पाया। उनकी पीड़ा व पढ़ाई की लगन देख प्रतिकुलपति ने उसे देसंविवि से एमसीए करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि शांतिकुंज-देवसंस्कृति विश्वविद्यालय परिवार उनकी पढ़ाई का खर्च उठायेगा व देव संस्कृति विश्वविद्यालय दिव्यांग बच्चों का मनोबल बढ़ाने में पूरा सहयोग करेगा।
                सूरत की रहने वाली पूर्व शिक्षिका हेमांगिनीबेन देसाई सन् 2006 से दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी उठा रही हैं। हेमांगिनीबेन के सत्प्रयासों से यहाँ के कई दिव्यांग छात्र-छात्राओं ने भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा में प्रावीण्य सूची में अपना स्थान बनाया है। अब तक वे करीब तीन हजार से अधिक दिव्यांग बच्चों को पढ़ा चुकी हैं। इनमें कई दिव्यांग बच्चे चिकित्सा, संगीत, शिक्षा व व्यवसाय के क्षेत्र में सेवा कर रहे हैं। साथ ही वे दिव्यांग बच्चों को भारतीय संस्कृति का पाठ भी पढ़ाती हैं।


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