Published on 2019-05-31 HARDWAR
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हरिद्वार 30 मई।
गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में साधना शिविर के अलावा शिक्षक गरिमा शिविर, बाल संस्कारशाला, नैतिक प्रशिक्षण शिविर आदि चलाये जा रहे हैं। तीन दिवसीय शिक्षक गरिमा शिविर में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश व महाराष्ट्र से आये शिक्षक व शिक्षिकाएँ शामिल रहे। गुरुवार को इस शिविर का समापन हो गया।

      प्रतिभागियों से भेंट परामर्श के क्रम में अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. प्रणव पण्ड्या ने कहा कि संस्कृति वह है, जो हमारे संस्कारों को पल्लवित करती है, बढ़ाती है और संस्कारवान बनाती है। संस्कृति मनुष्य को मानसिक शांति व सुख प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति के द्वारा श्रेष्ठतम संस्कारों का निर्माण करना है। भारतीय संस्कृति ही विश्व का नवनिर्माण कर सकती है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के माध्यम से बाल्यकाल से ही संस्कृति बीजारोपण करना श्रेष्ठतम कार्य है। शैलदीदी ने कहा कि परिवार, समाज को सभ्य व सुसंस्कृत बनाना हो, तो संस्कार के साथ स्वच्छता का भी ध्यान रखना होगा। स्वच्छता से ही तन, मन पवित्र रहता है।

      शिविर के अंतिम सत्र को संबोधित करते हुए शांतिकुंज के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता श्री वीरेश्वर उपाध्याय ने कहा कि आज जिस तरह की विपदाएँ हैं, उनसे निजात पाने के लिए प्राकृतिक रूप से समाधान खोजने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि ऊँचे आदर्शों व महान कार्यों के लिए समर्पण भाव आवश्यक है। व्यवस्थापक श्री शिवप्रसाद मिश्र ने कहा कि भारतीय संस्कृति विश्व की महान संस्कृति है। इससे ही विश्व का कल्याण संभव है।
      भासंज्ञाप के समन्वयक श्री प्रदीप दीक्षित ने बताया कि तीन दिन तक चले इस शिविर में छग, मप्र, व महाराष्ट्र प्रांत के सैकड़ों शिक्षक, शिक्षिकाएँ एवं भारतीय संस्कृति को जन-जन तक फैलाने में जुटे युवा शामिल रहे। उन्होंने बताया कि कुल सोलह सत्रों में प्रतिभागियों को सहकार, सहयोग के साथ सफलता के विविध पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी गयी। वहीं विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण में सहायक विभिन्न पहलुओं को जेपी वर्मा, श्याम बिहारी दुबे, कैलाश महाजन आदि विषय विशेषज्ञों ने उकेरा।


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