Published on 2019-07-26 HARDWAR

हरिद्वार 26 जुलाई।

देसंविवि के कुलाधिपति श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या ने विश्वविद्यालय के नवप्रवेशी छात्र-छात्राओं के नये शैक्षिक सत्र का शुभारंभ के अवसर पर गीता का मर्म सिखाया। इसके साथ ही विद्यार्थियों के विधिवत् पाठ्यक्रम का पठन-पाठन का क्रम की शुरुआत हो गयी।
                इस अवसर पर कुलाधिपति डॉ. पण्ड्या ने विवि की मर्यादा व अनुशासनों से अवगत कराते हुए कर्मों के प्रति समर्पण को श्रेष्ठतम साधना बताया। उन्होंने कहा कि अपने चिंतन को हमेशा विधेयात्मक ही रखें और कर्म ऐसे करो, जिससे आपको वर्षों-वर्षों तक याद किया जा सके। उन्होंने कहा कि जिस तरह अर्जुन युद्ध के मैदान में पहुँचने पर तनाव से भर गया था, फिर भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उस तनाव से बाहर निकाला, पश्चात उनके कर्मों को याद दिलाते हुए युद्ध करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि देसंविवि अपने विद्यार्थियों के तनाव को कम करने के विविध आयाम चलाते हैं, जिससे छात्र-छात्राएँ तनावमुक्त हो, अपने कर्मों के प्रति लगन व मेहनत से आगे बढ़ते रहें। उन्होंने कहा कि कर्म से जीवन परिभाषित होता है। योगी की तरह कर्म करो। उन्होंने कहा कि चिकित्सक, शिक्षक व विद्यार्थियों आदि के अलग-अलग युगधर्म-कर्म है। सभी को अपने नैतिक दायित्वों-कर्मों का ईमानदारी के साथ पालन करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। कुलाधिपति ने श्रीमद्भगवतगीता व रामचरित मानस के विभिन्न कथानकों व भारतवर्ष के सच्चे वीर सपूतों को याद करते हुए उनसे प्रेरणा
लेने की बात कही।
                इससे पूर्व कुलाधिपति श्रद्धेय डॉ. पण्ड्या ने विवि के कुलपिता युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं कुलमाता भगवती देवी शर्मा के चित्रों पर पुष्प अर्पित कर दीप प्रज्वलन किया। पश्चात सितार, वायलिन, वासुरी आदि वाद्ययंत्रों के सुमधुर तालों के साथ युगगायकों ने कर्म में ऐसे मर्म भरो.... संगीत प्रस्तुत किया। विवि के नये सत्र के प्रथम कक्षा के अवसर पर कुलाधिपति डॉ पण्ड्या ने नवप्रवेशी व पुरातन छात्र-छात्राओं के आध्यात्मिक व सामाजिक जिज्ञासाओं का समाधान भी किया। इस दौरान कुलपति श्री शरद पारधी, कुलसचिव श्री बलदाऊ देवांगन, समस्त विभागाध्यक्ष, शिक्षक-शिक्षिकाएँ, छात्र-छात्राएँ तथा शांतिकुंज व ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के अंतेवासी कार्यकर्तागण उपस्थित रहे।


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