Published on 2019-08-06

तीन दिवसीय गुरुपूर्णिमा समारोह में प्रेरणा, प्रोत्साहन, उत्साहवर्धन, मार्गदर्शन का क्रम निरंतर चलता रहा।
कई वरिष्ठ वक्ताओं के उद्बोधन हुए। प्रस्तुत है उनके संदेश का सार।


अंत:करण को निर्मल करें
• श्री शिवप्रसाद मिश्रा जी
दुनिया का मालिक हमारे बीच अवतरित हुआ है। उनसे हमें क्या नहीं मिला? वे क्या नहीं दे सकते? लेकिन उनकी कृपा को अनुभव करने के लिए उपासना, साधना, आराधना, जप- तप जैसे पूज्य गुरुदेव द्वारा बताये उपचारों को हम निष्ठापूर्वक करते हुए हम अपनी अंतरात्मा को निर्मल करते रहें।


प.पू. गुरुदेव के आस्था स्वरूप को समझो, अपनाओ
• श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी
हमें गुरुदेव के प्रति अपनी आस्था प्रगाढ़ करनी चाहिए, उनके आस्था स्वरूप को समझेंगे, तब उनके पास पहुँचेंगे। उनके निकट पहुँचने की कोशिश करो तो अनुभव करोगे कि बड़ी बेताबी के साथ गुरुदेव हमारा हाथ पकड़कर हमें ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
जिन्होंने आस्था की आँख से गुरुदेव को देखा है, उनके सिद्धांतों और विचारों को जीवन में अपनाया है, जीवन को साधना और सेवा में लगाया है, वे उनसे कहीं ज्यादा नैष्ठिक हैं जो गुरुदेव को शरीर रूप में ही देखते और समझते रहे हैं।
अपने सौभाग्य को पहचानो


• डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी ऐसे लोग कभी- कभी आते हैं, जिनके आने से कुल पवित्र हो जाते हैं, जननी कृतार्थ हो जाती है और धरती धन्य हो जाती है। परम पूज्य गुरुदेव एवं परम वंदनीया माताजी का व्यक्तित्व ऐसा ही था। हमारा परम सौभाग्य है कि वे हमें गुरुरूप में प्राप्त हुए। आवश्यकता है इस सौभाग्य का बोध करने की और उनके अंग- अवयव बनकर समाज और संस्कृति के पुनरुद्धार के गुरुकार्य में अपना सर्वस्व समर्पित कर देने की।


समर्पण में शर्त न हो
• श्रीमती यशोदा शर्मा जी
समर्पण में शर्त नहीं होनी चाहिए। गुरुवचनों में शंका और अविश्वास नहीं होना चाहिए। आँधी- तूफानों की चिंता न करते हुए बस एक ही संकल्प रहे- करिष्ये वचनं तव।

अन्य वक्ता श्री ब्रजमोहन गौड़ जी ने ‘वस्तु अमोलिक दी मेरे सद्गुरु ...’ विषय पर और डॉ. ओ.पी. शर्मा जी ने परम पूज्य गुरुदेव द्वारा बताये गये यज्ञ चिकित्सा सूत्रों पर प्रकाश डाला। जीवन और पर्यावरण पर पड़ने वाले यज्ञ के प्रभावों की जानकारी दी।


संतों का अनुसरण करो • श्री शरद पारधी जी
संतों का ऐश्वर्य उनके शुद्ध आचार- विचारों में होता है। हमें इसी पथ पर अग्रसर होना चाहिए। साधन- सुविधाओं की होड़ छोड़कर उत्कृष्ट चिंतन, सादा जीवन अपनाना चाहिए। गुरु के बताये उपासना, साधना, सेवा, स्वाध्याय के पथ पर चलते हुए निश्चित ही हम उनकी निकटता का अनुभव करने लगते हैं।


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