Published on 2019-10-20
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प्रज्ञा पीठ कुँवाखेड़ा पर साप्ताहिक यज्ञ करते परिजन।


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अभी तो

अभी तो मथने को सारा समुंद्र बाकी है,अभी तो रचने को नया संसार बाकी है,।अभी प्रकृति ने जना कहां नया विश्व है ?अभी तो गढ़ने को नया इंसान बाकी है।।अभी तो विजय को सारा रण बाकी है,अभी तो करने.....

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सभी बढें हैं

सभी बड़े हैं ,सभी चले हैं गुरुवर तेरी राहों में।तरह तरह के फूल खिले हैं ,गुरुवर तेरी छांव ।।तपती हुई रेत थी नीचे, ऊपर जेठी घाम थीदुनिया में तो चहु ओर से मिली तपिश है आग की ,आकर मिली हिमालय.....

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स्वच्छता मनुष्यता का गौरव गन्दगी हटाने में उत्साह रहे.....