Published on 2020-03-12
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शिवरात्रि पर्व पर देव संस्कृति विश्वविद्यालय परिसर में स्थित प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर प्रांगण में श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी, श्रद्धेया शैल जीजी ने भगवान शिव का महाभिषेक किया। आदरणीय डॉ. चिन्मय जी, आदरणीया शेफाली जीजी भी साथ थे। शान्तिकुञ्ज के व्यवस्थापक आदरणीय श्री शिव प्रसाद मिश्रा जी के नेतृत्व में युग पुरोहितों के लय, ताल एवं संगीतयुक्त वैदिक मंत्र, युगगायकों द्वारा गाये गए प्रज्ञागीत, रुद्राष्टक, महाकालाष्टक तथा सितार, शंख, डमरू के दिव्य निनाद से उपस्थित हज़ारों श्रद्धालुओं के अंतस् को झंकृत कर दिया। इस आस्था को दिशा दी श्रद्धेय द्वय के पर्व संदेश ने। श्रद्धेया जीजी ने कहा, ‘‘जो दूसरों के लिए जीवन जीते हैं उनके नाम के आगे ‘महान्’ या ‘महा’ शब्द जुड़ जाया करता है। बाकी सब देव हैं, अकेले शिव महादेव हैं। जब समुद्र मंथन से गरल निकला तो सब छोड़- छोड़कर भागने लगे। भगवान शिव ने सृष्टि को पतन से बचाने के लिए, दूसरों को जीवन देने के लिए उस गरल को अपने कंठ में धारण कर लिया। वे महादेव कहलाए। पर्व की प्रेरणा है कि हम दूसरों के लिए जीवन जिएँ। परम पूज्य गुरुदेव दूसरों की भलाई के लिए हमेशा ही गरल पीते रहे मान का, अपमान का।
न जाने किस- किस ने क्या- क्या कहा, लेकिन उन्होंने कभी अपना रास्ता नहीं छोड़ा, आदर्शों से नाता नहीं तोड़ा। उनके बच्चे उनके बताए रास्ते से कैसे पीछे हट सकते हैं? आज के दिन हम महाकाल के रुद्राभिषेक के साथ- साथ अपने अन्दर भी एक अभिषेक करें कि हम जिएँगे दूसरों के लिए। हमारी खुद की जिंदगी में चाहे कितना ही कोई ही गरल दे जाए, लेकिन हमारे अंतरंग में भाव यही रहे, भगवान सबका कल्याण हो।’’ इससे पूर्व श्रद्धेय डॉक्टर साहब ने कर्मकाण्ड की महत्ता समझाई। उन्होंने कहा कि शिव का अभिषेक हमें श्रेष्ठता को दुग्ध (पोषकता), मधु (मिठास- विनम्रता), घृत (स्नेह, सद्भाव), गंगाजल (पवित्रता) जैसे सद्गुणों से स्नान कराते हुए चंदन (यश, कीर्ति), पुष्प (उल्लास), वस्त्र (प्रतिष्ठा) शृंगारित करने की प्रेरणा देता है। जीवन में श्रेष्ठता को, शिवत्व को धारण करने का यही एकमात्र विधान है।


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